गुरुवार, 26 जनवरी 2023

देश मे नेतृत्व परिवर्तन की जरूरत

 आज देश मे सत्ता बदलने का समय आ गया है।श्रीमती इंदिरागांधी के समय जो तानाशाही का तरीका अपना कर देश की सत्ता पर काबिज रहने का जो उपाय और प्रयास किये गए थे वही प्रयास वर्तमान सरकार भी कर रही है ।झूठे वादे गरीबो को लुभाने के लिए फ्री अनाज,निजी आवास की रेवड़ी तथा मीडिया की स्वतंत्रता ,न्यायपालिका के अधिकारों में हस्तक्षेप ,कुछ पूंजीपतियों के इशारे पर psu संस्थानों की बिक्री ,सरकारी नॉकरियों में  छटनी सेना की भर्ती में हस्तक्षेप ,सरकारी बैंकों से असुरक्षित कर्ज देने का दबाव ये जाहिर करता है कि इन लुभावने जुमलों के आधार पर येन केन प्रकारेण सत्ता में बने रहो ।समाज मे धर्म विभेद, जाती विभेद हिन्दू मुस्लिम में माइक्रो स्तर पर झगड़े ,मंदिर मस्जिद का विवाद ,इस प्रकार निम्न स्तर की सोच का क्रियान्वयन देश की पुरातन गंगा जमनी तहजीब को तोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।जिसके कारण देश आर्थिक रूप से कमजोर हो रहा है। देश पर जीडीपी का 93प्रतिशत कर्ज हो गया जो 30 था ।सड़को के निर्माण की लागत टोलटैक्स से वसूली जा रही है जो रोड टैक्स के अलावा है जिससे मालभाड़े में बढ़ोतरी हो रही है,पेट्रोलियम प्रोडक्ट पर भारी exiseduty लगाई जा रही है ।राज्यों के हिस्से में भेदभाव किया जा रहा है ,ये  इस सरकार के आर्थिक मैनेजमेंट की कमियों को दर्शाता है ,         इन सब कमियों और नीतियों को देखते हुए इस देश की युवा शिक्षित पीढ़ी का भविष्य अंधकारमय दिख रहा है।इसलिए अब इस देश को एक नए नेतृत्व की जरुरत है।इन तमाम कमियों के लिए देश की तमाम राजनैतिक पार्टिया बराबर की दोषी हैं ।इस सरकार ने जो शासन करने की जो दिशा दी है ,भविष्य में दूसरी पार्टियां इसका अनुशरण नहीं करेंगी इसकी क्या गारंटी  है ।इन तमाम पार्टियों को इसका ज्ञान हो गया है।इस देश मे बहुसंख्यक वोटर अशिक्षित, और गरीब है उसे वोट की ताकत का ज्ञान नहीं है ।वो पूरे साल तकलीफ में रहता है,और वोटिंग के दिन बिक जाता है  उसे उस दिन का खाने का खर्च पार्टियां उठा लेती हैं ।उसे अपने अनिश्चित भविष्य के साथ जीने की आदत हो गई है।और जो सम्पन्न वर्ग है उसे कैसे सुविधा लेनी है उसकी कला वो सीख गया है।।                                              इससे जाहिर होता है कि तमाम राजनैतिक पार्टियां  कुछ दबंगों, पूंजीपतियों, और असामाजिक तत्वों का काकस बन गई हैं जो मिलकर सरकारी संसाधनों का और धन का उपभोग कर रहीं हैं।इसमें नॉकरशाह उनके साधन और धन उपार्जन साध्य बन गया ।इसका इलाज एक ही है जो  देश की युवा पीढ़ी सड़क पर उतरे और व्यक्तियों का चुनाव करे जिसकी छवि निर्दाग ,निष्कलंक शिक्षित हो  जो किसी राजनीतिक पार्टी से जुड़ा न हो जिसे क्षेत्र विशेष में विशिष्टता प्राप्त हो उसे चुन कर लोकसभा ,विधानसभा में भेजे ।तभी इस देश को नई दिशा मिल सकेगी ।उसको जिताने के लिए जनता के बीच मे जाना पड़ेगा जैसे 1974 में शरद यादव को जन प्रतिनुधि के  रूप में भेजा था                                                                                       जहां तक चुनाव फण्ड की व्यवस्था का सवाल है एक रुपया एक वोट की पद्धति अपनानी पड़ेगी या जिले स्तर पर कॉलेज,स्कूल यूनिवर्सिटी स्तर पर छात्रों की कमेटी बनानी पड़ेगी जो जनता से सोशल मीडिया के माध्यम से चंदा इकट्ठा करके इसकी व्यवस्था करनी पड़ेगी ।काम कठिन है पर असम्भव नहीं है ।

शनिवार, 27 अगस्त 2022

तीसरे विश्व युद्ध की और यूरोप

 दुनियां की दो बड़ी शक्तियां अपने आप को  सुपर पावर बताने की होड़ में दुनिया को युद्ध जैसी विभीषका में झोंकने की और प्रयास रत्त हैं ।कोरोना की महामारी से उबर नहीं पाये थे और अब रूस यूक्रेन युद्ध पिछले 6 माह से चल रहा है जिसमे यूक्रेन को मोहरा बना कर अमरीका और रूस अपने हथियारों के प्रदर्शन की होड़ में लगे हैं ।दूसरी तरफ चाइना ,ताइवान को कब्जाने तयारी में लगा है ।ये सारी शक्तियां उस देश पर हमला नहीं करती जो परमाणु सम्पन्न है ।ये सब सोची समझी रन नीति के तहत ये चाल चलते हैं इससे निरीह जनता गरीबी और असमंजस की जिंदगी जीने को मजबूर हॉती। है इस प्रकार के संकट के हल के लिए UNO  निरीह बना तमाशा देख रहा है ये संस्था भी इन सुपर पावर देशों के प्रभाव में कोई निर्णय नही लेता तब इसका औचित्य क्या है ।मानवता और सम्मान पूर्वक जीवन जीने का अधिकार देने वाला समाज मूक दर्शज बना देख रहा है ।ऊपर से प्राकृतिक आपदा से दुनिया के संपन्न देश ग्रषित है इंसान का जीवन आर्थिक रुप से  टूट गया है उसकी भरपाई के लायक सरकारों के पास साधन नही बचे ।इसे प्रकृति का आक्रोश या प्रलय नहीं तो क्या कहेंगे ।विश्व बिरदारी के पुराधावों को एक आपातकाल मीटिंग बुला कर विश्व शांति का प्रयास करना चाहिए।दुनिया के पूंजीपतियों को विचार करना चाहिये जब मानवता ही नही बचेगी तो इस संचित  पूंजी का क्या उपयोग ।वक्त का तगादा है विश्व की महा शक्तियॉ के बीच सुलह कराई जाए और दोषी राष्ट्र पर बंदीश लगाई जाए या उसे UNO ,WTO से बाहर किया जाए ।तथा उसके प्राक्रतिक संसाधनों  के दोहन पर प्रतिबंध लगा कर मानव हित मे अंतरराष्ट्रीय संस्था के नेतृव में उत्पादन और वितरण की व्यवस्था की जाए अन्यथा विश्व एक विश्व व्यापी संकट के चक्र में फंसता जाएगा  

सोमवार, 18 जुलाई 2022

एक और क्रांति की ज़रूरत

 इस देश में मुख्यतः तीन क्रांतियां हुई है , जिनका आधार जनता के बीच दबा हुआ गुस्सा था।  गुस्सा उनके साथ हो रहे अत्याचार जो कुछ दीखता था और कुछ छुपा हुआ था।  विद्रोह छुपे हुए अत्याचार के कारण किसी एक व्यक्ति के अनुभव एवम उसकी सहनशक्ति की सीमा को लांघने के कारण हुआ।  पहेली क्रांति १८५७ में सापेक्ष अत्याचार की अपेक्छा एक बोने से अत्याचार [बन्दूक की गोली में गाय के मांस का उपयोग] के कारण प्रशासन से विद्रोह के रूप में मंगल पांडेय ने शुरू की थी।  जो देश के कोने-२ में फैल गयी , यदि यह व्यवस्थित तरीके से संचालित होती तो देश १८५७ में ही आज़ाद हो जाता।  परन्तु यह शासन की भागेदारी से वंचित और उपेक्छित वर्ग के द्वारा संचालित थी और उपेक्षित शासको का स्वार्थ निहित था ,जिसके कारण यह क्रान्ति सफल नहीं हो पायी। 

दूसरी क्रान्ति १९४२ में गांधीजी के कारण शुरू हुई , पचासी साल के लम्बे अंतराल के बाद साऊथ अफ्रीका में उनके साथ अंगेजो द्वारा किये गए अपमान से उत्पन्न गुस्से के कारण बदले की भावना से इस क्रान्ति का उदय हुआ।   किसी हद्द तक यह क्रांति सफलतम की श्रेणी में गिनी जाएगी।  क्योकि इसमें निजी स्वार्थ निहित नहीं था , यह व्यवस्थित भी थी क्योकि जन समुदाय एक व्यक्ति के पीछे था , और आक्रोश का प्रदर्शन कुछ अन्य हाथो में था।  इनके मिलेजुले प्रभाव से क्रान्ति सफल रही, परन्तु निष्कंटक प्रशासन और भौतिक सुख ने इस प्रतिवर्तन को  तानाशाही प्रवर्ति का रुप दे दीया। सामूहिक नेतृत्व एकल में केंद्रित हो गया , जो धीरे-२ जनता से संवादहीनता में परिवर्तित होता गया और तानाशाही की और अग्रसर होने लगा , जिसका परिणाम ३२ साल बाद १९७४ में श्री जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रान्ति के रूप में प्रकट हुई। यह तीसरी क्रांति हुई।   

चूकि यह क्रान्ति एकल तानाशाही के विरुद्ध एक व्यक्ति द्वारा लड़ी गयी थी तथा इसमें दबंगो और छात्रों का साथ लिया  गया था , और सदियों से उपेक्छित वर्ग की भागेदारी ज्यादा थी , तथा परिवर्तन  के बाद सत्ता भी इन्ही के हाथो में आनी थी , इस लिए इस उपेक्छित वर्ग के सत्ता में आने के बाद जयप्रकाश जी द्वारा अपेक्छित क्रांति उनके जाने के बाद नेतृत्वहीन हो गयी , इस कारण जनहित, "समाजवाद" के नाम से सत्ता हासिल करके कुछ राज्यों में परिवारवाद में परिवर्तित हो गयी। 

अब चौथी क्रांति की जरुरत है।  समीक्षा की जाए तो दूसरी क्रान्ति  अधिक समय तक टिकाऊ रही क्योकि इसमें उद्देश्य शुद्ध एवम व्यापक था।  पहेली क्रांति ३ साल में बुझ गयी , दूसरी क्रांति ३२ साल तक जिन्दा रही , तीसरी ७ साल में भुजने लगी।  अब चौथी उम्मीद करता हूँ की युवाओं द्वारा आएगी जो HIGH-TECH होनी चाहिए।  यह व्यवस्था परिवर्तन की होनी चाहिए,  क्योकि शिक्षा का स्तर बढ़ा है , अपेक्षाएं बढ़ी है , सहनशक्ति शिक्षित वर्ग में कम होती है , अन्याय का प्रतिकार जल्द उपजता है , संभव है जल्द ही SILENT क्रांति होनी चाहिए जो BALLOT से ही आएगी।  इसमें दबंगो और तथाकथित "परिवारों" से निजाद मिलेगी। 

शुक्रवार, 10 जून 2022

लोकतंत्र बनाम हिन्दू राजशाही

 जिस देश को 700 साल मुगलों और  200 साल अंग्रजो की गुलामी से मुक्त कराने में महात्मा गांधी,नेहरू,सरदार पटेल ,सुभाषचंद्र बोस,और भगतसिंग जैसे सेनानियों के अथक प्रयासो से  खण्ड खण्ड भारत को अहिंसा के हथियार से आधुनिक हथियारों से लैस लुटेरों के चंगुल से बिना खून बहाये आजाद कराया ,और नेहरू के प्रयासों से हिन्दू राजशाही के आदी देश को यूरोप की आधुनिक लोकतांत्रिक प्रणाली से शासन करने की पध्दति को अपना कर विश्वपटल पर देश की उपस्थिति का जो प्रयास किया उसे आज के सत्ताधीश ध्वस्त करने का प्रयास कर रहे हैं ।।                                                          राजनीति जो सेवा का  क्षेत्र कहलाता है वो व्यापार होता जा रहा है ,जो एक बार चुन कर सत्ता का स्वाद चख लेता है उसकी ये विरासत बन जाती है ,उसका पूरा परिवार इस सत्ता सुख  को भोगने के लिए किसी भी प्रकार के आचरण करने में झिझकता नही है ।एक किस्म की पुरानी राजशाही की छाप राजनेतावों में परिलिक्षित होने लगी है ।विरोध के स्वर को दबाने के लिए सुचारू प्रशासन के लिए निमित संस्थावों  का उपयोग किया जाने लगा है ।देश की 48%गरीब और निरीह जनता को फ्री राशन बाँट कर एक नया लाभार्थी वर्ग बना दिया गया है जो इनको सत्ता में बिठाने का स्थायी जरिया बन गया है ।।    देश के बेरोजगार नवजवानों को रोजगार उपलब्धता की जगह मंदिर ,मस्ज़िद,हिन्दू,मुसलमान के झगड़ो में उलझा दिया है । चूंकि इनके पास कोई विज़न नहीं है  कोई योजना नहीं  देश को गरीबी ,बेरोजगारी से निजाद दिलाने के लिए सिर्फ स्वंय के सत्ता सुख के अलावा ,देश  की हालत श्रीलंका और बेनेजुवेला जैसी होती जा रही है।और तो ओर देश की सेना की ,रेलवे की भर्ती पिछले दो साल से रुकी है जवान बच्चों की उम्र निकलती जा रही है ,चाइना और रूस यूक्रेन जैसे देशों में सेना में भर्ती के लिए जवान मिल नहीं रहे इन्हें आफ़ग़ानिस्तान  जैसे देशों से जवानों को लेना पड़ रहा है ।और हमारे यहां भर्ती के लिए होड़ लगी है ।नेहरू ने जो उधोग लोगो को रोजगार देने के लिए सरकारी क्षेत्र में लगए थे जो सिर्फ रोजगार देने के लिए न कि मुनाफा कमाने के लिए उन्हें बेचा जा रहा है ।नवरत्नों को कोयले के भाव मे अपने करीबी उधोगपतियों को बेचा जा रहा है ,जो विरोध करता है उस पर ED और CBI का छापा डलवाया जा रहा है ।।        इसका एक मात्र उद्देश्य OBC ST/SC  का आरक्षण खत्म करना है किसी भी सरकार को तीन (स) शिक्षा,सुरक्षा, स्वास्थ्य पर ज्यादा खर्च करना चाहिए ये सरकार इन्ही क्षेत्रो में उदासीन है इसमें दो  क्षेत्रों  का बजट विश्व के किसी भी विकाशशील देशों से बहुत कम है ।जो सरकार अपने देश के नागरिकों को अच्छी शिक्षा अच्छा  सवास्थ्य नही दे सकती उसे सत्ता में रहने का  कोई अधिकार  नहीं ।।            जिस देश मे चार  चार मौसम,  उपजाऊ कृषि भूमि अथाह खनिज भंडार अनगिनत नदियां हों उस देश मे गरीबी देख कर देश के सत्ताधारियों की काबलियत पर सवाल उठना लाजमी है ।शिक्षा ओर स्वास्थ्य क्षेत्र का बजट घटाया जा रहा है प्राइवेट सेक्टर को बढ़ाया जा रहा है इस सेक्टर पर राजनेतावों और नॉकरशाहों का आधिपत्य है। महंगी शिक्षा और महंगा इलाज गरीबों के लिए अभिशाप बन गया  है।।                                                                                     खनिज संपदा में विकीवीडिया के सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक इस देश मे 2012 के आंकलन के अनुसार    अभ्र्क़ का विश्व  का सबसे बड़ा भंडार है ,आयरन और का तीसरा boxide का पांचवां और थोरियम का सबसे बड़ा भंडार है ।इन खनिजो का दोहन करके ओर परिष्कृत करके विश्व बाजार में बेच कर देश मे बहने वाली नदियों को जोड़ कर नहरों का जाल  बिछा कर ओर विधुत उत्पादन किया जाए तो कारखानों को प्रचुर मात्रा में बिजली और कृषि को जल की सुगम उपलब्धता से देश के युवाओं को रोजगार और किसान को खेती से भरपूर रोजगार प्राप्त हो सकता है ।परंतु दुर्भाग्य से जमीनों पर राजनीतिक सरंक्षण प्राप्त भूमाफियों का कब्जा है ,शिक्षा और स्वास्थ्य पर भी राजनेतावों का कब्जा है खनिज पर बड़े बड़े उधोगपतियों का जो किसी न किसी राजनीतिक पार्टियों से जुड़े हुए उनका कब्जा है अर्थात लोकतंत्र पर राजशाही काबिज हो गई आजादी के पहले की 630 रियासतें फिर से दूसरे रूप में जिंदा हो गई ।अधिकांश सांसद, विधायक ,बड़े नॉकरशाह पूरी व्यवस्था पर काबिज हो गए महसूस होता है, देश के DNA में ही राजशाही है।लोकतांत्रिक व्यवस्था के नाम पर देश की जनता के साथ छलावा हो रहा है ।ये लोकतांत्रिक प्रणाली उन्ही देशो में सफल हुई है जहां शिक्षा का स्तर शत प्रतिशत है।अशिक्षित देशों में लोकतंत्र शोषण का माध्यम बन गया है ।बिना शिक्षा और स्वास्थ पर खर्च को बढ़ाये लोकतंत्री प्रणाली सफल  होगी इसमे संसय है ।एक इंटरव्यू में ब्लिट्ज के संपादक करंजिया से कहा था अगर इंग्लैंड को देखे तो वह औपचारिक रूप से चर्च ऑफ इंग्लैंड से एफफिलिअटेड ,लेकिन वहां का समाज लोकतांत्रिक हैं ।दूसरी तरफ हम संवैधानिक रूप से लोकतांत्रिक हैं लेकिन हमारा समाज लोकतांत्रिक नहीं है ।हमारे देश की राजशाही व्यवस्था हिन्दू है, इसलिए हमें सक्रिय व सचेत रूप से समाज को लोकतांत्रिक बनाने की कोशिश करनी होगी ।इसीलिए राजमाता सिंधिया ने कहा था कि हमारी तपों भूमि  लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुकूल नहीं थी।इसके बावजुद नेहरूजी ने इस देश मे लोकतांत्रिक व्यवस्था का पौधा लगाया ।

बुधवार, 4 मई 2022

पेट्रोलियम लाबी

 विश्व के अर्थ तन्त्र की तीसरी लाबी पेट्रोलियम पदार्थ याने क्रूड ऑयल के उत्पादकों की है ।इस तेल के स्त्रोत मुख्यतया अरब,गल्फ देशों में है प्रकृति ने यही एक मुख्य खनिज इन देशों को बहुतायत में दे रखा है ।चूंकि इन देशों में लोकतंत्र नही के बराबर है इनके शासक मुगलकालीन खलिफावों के पास है,और इनके पास इतने संसाधन नहीं हैं कि वो इस खनिज को एक्स्प्लोर करके रिफाइन करके मार्केटिंग कर सके ,इसलिए इस कार्य को अमरीका के यहूदी पूंजीपतियों ने अपनी रिफाइनरी डाल कर इन देशों के नवाबों को खनिज तेल का मूल्य देकर रिफाइन तेल उधोग पर कब्जा कर लिया ।और OPEC जैसी संस्था बना कर इसके भाव ,सप्लाई,और उत्पादन पर एकाधिकार स्थापित कर लिया ।चूंकि विश्व के एक छोटे से भाग में ही इसकी उपलब्धता है और मांग ज्यादा है ,साथ मे इसके व्यापार की ट्रेडिंग करने के लिए अमेरिकन करेंसी की बाध्यता लगा रखी है ।इसलिए इस व्यापार पर भी अमेरिकन पूंजीपतियों का कब्जा है ।सिर्फ रूस एक मात्र देश है जहां इसका भंडार बहुतायत में है,जो विश्व की जरूरतों का 30%पूरा कर सकता है इनकी रिफाईनरी पर यहूदियों का  स्वामित्व नहीं है, इस देश को साम्यवादी बता कर उसे नीचा दिखाने का प्रयास किया जाता रहा है ।।                                इस प्रकार इन तीनो लॉबियों (फार्मा, हथियार, आयल) के द्वारा विश्व पर राज करने के लिए समय समय पर इनका उपयोग डर का माहौल पैदा करके किया जाता रहा है चूकि ये इतने साधन संपन्न हो चुके हैं कि आने वाले भविष्य का निर्धारण भी इन्ही के हाथों में रहेगा ।ये चाहें तो विश्व मे लोकतांत्रिक व्यवस्था लाएं या तानाशाही इनके चंगुल से निकलना असम्भव सा लगता है ।विज्ञान का उपयोग जन सुविधावों की जगह विनाश के लिए किया जा रहा है ।इस भौतिकवाद ने सामाजिक ताना बाना ध्वस्त कर दिया ,मानवता खत्म हो रही है ।परिवार टूट रहे हैं लोगों का ध्यान पूँजीनिर्माण और सुरक्षित जीवन की और ज्यादा हो गया है ।जब परिवार टूटेगा जो राज्य,देशऔर विश्व की धुरी कहलाती है जब वोही टूट जाएगी तो इस विश्व का क्या होगा ? समाप्त 

हथियार लाबी

 कोरोना वायरस की महामारी से पूरी दुनिया निजात पाने ही वाली थी कि रूस ने यूक्रेन पर हमला कर दिया ।रूस ने अपने पुराने हो चुके जंक खाते हथियारों का जखीरा खत्म करने के लिए तथा नए हथियारों के प्रदर्शन से दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश अमरीका को चुनोती देते हुए ,किसी समय USSR का हिस्सा रहा यूक्रेन जिसने नाटो की सदस्यता के लिए आवेदन किया था को सबक सिखाने के लिए आधुनिक हथियारों से हमला करके ये जितलाने का प्रयास किया कि हमारी बिल्ली हमी से म्याऊं ।की कहावत को चरितार्थ करते हुए इस देश की जनता को पलायन करने को मजबूर कर दिया।और दुनिया को दिखा दिया कि हम उन हथियारों के निर्माता हैं जिनकी तोड़ किसी के पास नही ।।                                             विचारणीय प्रश्न ये है कि ये परमाणु सम्पन्न देश उन्ही देशो पर हमला क्यो करते है जिनके पास एटमी हथियार नहीं हैं ये भी सोची समझी रणनीति है ।ये उन्ही देशों पर अपने हथियारों का प्रदर्शन करते हैं जो क्या तो गरीब हैं या विकासशील देश है ।ये देश इन सम्पन्न देशो के हथियारों की प्रयोगशाला बन गई हैं ।जैसे इराक,अफगानिस्तान,और अब यूक्रेन ।इन देशों के शासकों ने इन सम्पन्न देशों की शर्तों को मानने से इनकार कर दिया तो इन शासको सत्ताच्युत करने के लिए निरीह जनता पर प्रहार करके डर का माहौल पैदा कर दिया ।ताकि बाकी देश अपनी सुरक्षा मजबूत करने के लिए इन हथियार निर्माता देशों से हथियार खरीदें ।UNO जिसकी स्थापना इन गरीब देशों को न्याय दिलाने या सहायता के उधेश्य से की थी वो भी तमाशबीन बना देख रहा है याने इस पर भी इन्ही निर्मातावो का कब्जा है ।जिस तरह WHO फार्मा लॉबी के प्रभाव में है उसी प्रकार UNO भी हथियार लाबी के प्रभाव में है ।इस का अर्थ ये निकलता क्या तो हर देश परमाणु सम्पन्न बने या वो तमाम देश जो गरीब है विकासशील हैं उन्हें अपना अलग से संगठन बनाना चाहिए ताकि ऐसी परिस्थिति में एक जुट होकर उस आक्रमणकारियों का मुकाबला कर सके और उस देश का बहिष्कार करें ।नहीँ तो ये देश आधुनिक टेक्नोलॉजी के नाम पर नए हथियारों के नाम पर धन उगाहते रहेंगे और गरीब बने रहेंगे ।संगठन और संख्या में बहुत ताकत होती है उसका प्रदर्शन और उपस्थिति दर्ज कराए बिना ये हमले और शोषण इस हथियारलाबी का होता रहेगा ---क्रमशः--पेट्रोलियम लाबी 

3 लॉबियों की ग्रिफ्त में दुनिया 1 फार्मा लाबी

 1) फार्मा लॉबी :--फरवरी2020 में विश्व मे फार्मा लॉबी ने कोरोना वायरस फैला कर एक नई महामारी को ईजाद करके विश्व मे हड़कम्प मचा दिया । करोड़ों लोग इस बीमारी की ग्रिफ्त में आये, करोड़ो लोग मर भी गए ।लेकिन इस कि दवाई आज तक ईजाद नही हो पाई।इस बीमारी की दहशत ने लोगों को घरों में कैद कर दिया ।शहरों में लोकडाउन कर दिया गया ।जिनके पास जो भी जमा पूंजी थी उन्होंने इस बीमारी से बचने के लिए खर्च कर दी न पूंजी बची न मरीज ।इस वायरस ने पहले बूढ़ों को और बाद में  जवानों को और अब बच्चों को ग्रिफ्त में लेने की who द्वारा सूचित किया गया । इसके बचाव के लिए मास्क  ,पीपी किट,सैनिटाइजर का उपयोग जरूरी करके इस उधोग को  जो मरणासन्न पड़ा था उसको अम्रत पिला दिया ।इस बीमारी ने वो अस्पताल जो बन्द होने की कगार पर थे उन्हें हाई टेक बना दिया ।एक साल क़े  बाद इस वायरस की वेक्सीन ईजाद की गई उसे जरूरी बता कर करोड़ो का धन कमाया गया ।अर्थात फार्मा लॉबी ने वायरस का डर फैला कर पूरी दुनिया के अर्थ तन्त्र को बर्बाद कर दिया और खुद दशाब्दियों के लिए आबाद हो गया ।फार्मा क्षेत्र को छोड़कर बाकी सभी उद्योग दिवालियापन की हद तक पहुंच गए ।इस बीमारी से मरने वालों का तो आंकड़ा सरकारों के पास है ।लेकिन भुख और दिवालिया होने के डर से आत्महत्या करनेवालों का आंकड़ा इनके पास नही है।जिसका असर दो साल बाद अब दिखने लगा है ।इससे साबित होता है कि इन आंकड़ों की बाजीगिरी से जनता में भय का वातावरण निर्मित होगा जिससे लोग डॉक्टरों और अस्पतालो में जाएंगे और इनका व्यापार और बढ़ेगा।जिस तरह डर का दूसरा नाम भगवान है उसी तरह डॉक्टर का दूसरा नाम भगवान (डर) बन गया ।इन तमाम अंतरराष्ट्रीय फार्मा कंपनियों के मालिक बहुतायत में अमेरिकन (यहूदी व्यापारी)हैं और चीन में इनका उत्पादन होता है ।इन दोनों ने मिलकर इस वायरस को विश्व मे फैलाया और विश्व पर शासन करने का प्रयास किया ।वो तो अच्छा हुवा भारत के लोगों का भौगोलिक स्थिति प्राकृतिक मौसम और भारतीय खान पान की वजह से यहां के लोगों का इम्यून सिस्टम मजबूत था नही तो इस वायरस से करोड़ो जाने जाती ।सरकारों को चाहिए इस प्रकार की लाबी का भंडाफोड़ किया जाए ओर जन हित मे कार्य करने के लिए इन पर दबाव बनाया जाए ।ताकि भविष्य में कोई संस्था इस प्रकार का कुकृत्य करने के पहले सोचने को मजबूर किया जाए ।इसमे UNO को हस्तक्षेप करके WHO का पुनर्गठन किया जाए  का प्रस्ताव सभी सदस्य को देना चाहिए ।----अगली कड़ी --हथियार लाबी --