उपरोक्त देश दो विभिन्न धर्मों को अपनाने वाले देश हैं।और इन देशों के धर्मो के बीच युद्ध तीसरे विश्व युद्ध की तरफ बढ़ रहा है,ईरान ने इस्लाम धर्म जरूर कबूला लेकिन उनकी रगों में पर्सियन खून है ।जो पुराना पारस मुल्क था ।जो सांस्कृतिक तरीके से एक सम्पन्न राष्ट्र था ।अमरीका यहूदीवाद ने पूंजीवाद को बढावा देकर विज्ञान का सहारा ले कर दुनिया पर राज करने का प्रयास किया । इस यहूदीराजतंत्र को ईरान अपने पुरातन संस्कृति और स्वाभिमान का प्रदर्शन करके पश्चिमी तंत्र को चुनौती देना चाहता है ।इसी प्रकार भारत भी इस पश्चिमी तंत्र को चुनोती देने का प्रयास कर रहा है ।क्योंकि इतिहास में भारत की जड़े भी विश्व के एक सम्पन्न राष्ट्र की रही है । यदि हम भी अपनी पुरानी युद्ध की पद्धति को अपनाते है तो हम भी विश्व शक्ति बन सकते हैं।हथियारों और ,टेक्नोलॉजी में हमारे पास विश्व स्तर के वैज्ञानिक हैं हमारे पास भरपूर खनिज भंडार है मार्केटिंग के लिए मजबूत व्यापारी सोच है,लोग भी हैं,आजादी के पहले हम व्यपार में विश्वगुरु थे सोने में व्यापर करते थे तभी सोने की चिड़िया कहलाते थे ।इसी चकाचोंध ने अंग्रेजों को इस देश ने आकर्षित किया ओर हमे लूटते रहे ।खुद सम्पन्न बन गए और हमे भिखारी बना गए ।हमे शिक्षा पर ज्यादा से ज्यादा खर्च करना चाहिए,पुरातन विज्ञान पर इनोवेशन पर खर्च बढ़ाना चाहिए।खनिज का इस्तेमाल करने के लिए नई टेक्नोलॉजी को ईजाद करनी चाहिए ।ईरान,रूस और भारत आपस मे संधि करके अपने हथियार और आवश्यक जरूरतों की आपस मे पूरी करने लग जाएं तो अफ्रीका और एशिया के देश इनके समर्थन में आ जाएंगे ।और ये देश आपस मिलकर एक नए करेंसी भी ईजाद कर सकते हैं ।इन देशों के पास समुद्र है खनिज है काबिल वर्क फ़ोर्स है पैसा है और सबसे बड़ी जनसंख्या है।प्रत्येक आवश्यक वस्तु,खनिज,प्रकृति का भरपुर सहयोग।यहाँ के लोग स्वभाव से जितने शांत है उतने ही जुझारू भी हैं ।यहां के लोग में देश के प्रति समर्पण की भावना भी बहोत है ।वसुदेव कुटुम्बकम, की भावना भारत के खून में है तो नेतृत्व क्यों नहीं,बस मैनेजमेंट कड़ा करना होगा।जवाबदारी तय करनी होगी। राजनीति का शुद्धिकरण करना होगा स्वार्थ मिटाना होगा सेवाभाव, समता मूलक समाज की भावना को धरातल पर उतरना होगा ।ये सब सिद्धान्त और नियम लागू किये तो विश्वगुरु बन सकते हैं ।। जहां तक टैलेंट का सवाल है भारत से सबसे ज्यादा छात्र हायर एजुकेशन के लिए लाखों रु खर्च करके विदेशों में अध्ययन के लिए जाते हैं इन्ही छात्रों की फीस से विदेशी यूनिवर्सिटीयां चल रही हैं। यदि भारत मे उचित शिक्षा देने की व्यवस्था और ईनकी प्राप्त शिक्षा का उपयोग देश की प्रगति के लिए किया जाए नए नए आविष्कारों को नए उधोगो में उपयोग किया जाए तो देश का उत्पादन भी बढ़ेगा तथा नए नए रोजगार भी पैदा होंगे।इसके लिये यूनिवर्सिटीज का उन्नयन करना होगा ,शिक्षा विद तैयार करने होंगे ,जो इस देश मे उपलब्ध है बस खोजना होगा ,देश को बढे बड़े उधोगपतियों का सहयोग लेना होगा ।आज भी विश्व की 12 विश्वस्तर की कंपनियों के CEO भारतीय हैं ,इनका भारत मे उपयोग क्यों नही होता? ब्रिटेन में ----1,36921 जर्मनी में –-----34702 फ्रांस में –-----8536 रूस में--------31444 कनाडा में--42,7085 सिंगापुर में----17000 ऑस्ट्रेलिया में --78093 अमेरिका में --3,31692 अर्थात 10,65,183 छात्र विदेशों में इंडिया टुडे के 18 जून 2025 के आंकड़ों के अनुसार पढ़ने के लिए जाते हैं।जिनकी सालाना फीस 40,000 डॉलर प्रति वर्ष होती है ।अर्थात करीब 42अरब रु हर साल देश के बाहर जा रहा है।इतने धन से तो इस देश मे सैंकड़ो यूनिवर्सिटी खुल सकती हैं।जिससे विदेश से भी छात्र यहां पढ़ने आ सकते हैं ।और देश की इकॉनमी भी बढ़ सकती है।
सोमवार, 20 जुलाई 2026
सदस्यता लें
संदेश (Atom)