सोमवार, 20 जुलाई 2026

अमरीका ,इस्राइल, ईरान युद्ध

 उपरोक्त देश दो विभिन्न धर्मों को अपनाने वाले देश हैं।और इन देशों के धर्मो के  बीच युद्ध तीसरे विश्व युद्ध की तरफ बढ़ रहा है,ईरान ने इस्लाम धर्म जरूर कबूला लेकिन उनकी रगों में पर्सियन खून है ।जो पुराना पारस मुल्क था ।जो सांस्कृतिक तरीके से एक सम्पन्न राष्ट्र था ।अमरीका यहूदीवाद ने पूंजीवाद को बढावा देकर विज्ञान का सहारा ले कर दुनिया पर राज करने का प्रयास किया । इस यहूदीराजतंत्र को ईरान अपने पुरातन संस्कृति और स्वाभिमान का प्रदर्शन करके  पश्चिमी तंत्र को चुनौती देना चाहता है ।इसी प्रकार भारत भी इस पश्चिमी तंत्र को चुनोती देने का प्रयास कर रहा है ।क्योंकि इतिहास में भारत  की जड़े भी विश्व के एक सम्पन्न राष्ट्र की रही है । यदि हम भी अपनी पुरानी युद्ध की पद्धति को अपनाते है तो हम भी विश्व शक्ति बन सकते हैं।हथियारों और  ,टेक्नोलॉजी  में हमारे पास विश्व स्तर के वैज्ञानिक हैं हमारे पास भरपूर खनिज भंडार है  मार्केटिंग के लिए मजबूत व्यापारी सोच है,लोग भी हैं,आजादी के पहले हम व्यपार में विश्वगुरु  थे सोने में व्यापर करते थे तभी सोने की चिड़िया कहलाते थे  ।इसी चकाचोंध ने अंग्रेजों को इस देश ने आकर्षित किया ओर हमे लूटते रहे ।खुद सम्पन्न बन गए और हमे भिखारी बना गए  ।हमे शिक्षा पर ज्यादा से ज्यादा खर्च करना चाहिए,पुरातन विज्ञान पर इनोवेशन पर खर्च बढ़ाना चाहिए।खनिज का इस्तेमाल करने के लिए नई टेक्नोलॉजी को ईजाद करनी चाहिए ।ईरान,रूस और भारत आपस मे संधि करके अपने हथियार और आवश्यक जरूरतों की आपस मे पूरी करने लग जाएं तो अफ्रीका और एशिया के देश इनके समर्थन में आ जाएंगे ।और ये देश आपस मिलकर एक नए करेंसी भी ईजाद कर सकते हैं ।इन देशों के  पास समुद्र है खनिज है काबिल वर्क फ़ोर्स है पैसा है और सबसे बड़ी जनसंख्या है।प्रत्येक आवश्यक वस्तु,खनिज,प्रकृति का भरपुर  सहयोग।यहाँ के लोग स्वभाव से जितने शांत है उतने ही जुझारू भी हैं ।यहां के लोग में  देश के प्रति समर्पण की भावना भी बहोत है ।वसुदेव कुटुम्बकम, की भावना भारत के खून में है तो नेतृत्व क्यों नहीं,बस मैनेजमेंट कड़ा करना होगा।जवाबदारी तय करनी होगी। राजनीति का शुद्धिकरण करना होगा स्वार्थ मिटाना होगा सेवाभाव, समता मूलक समाज  की भावना को धरातल पर उतरना होगा ।ये सब सिद्धान्त और नियम लागू किये तो विश्वगुरु बन सकते हैं ।।                                                                                           जहां तक टैलेंट का सवाल है भारत से सबसे ज्यादा छात्र हायर एजुकेशन के लिए लाखों रु खर्च करके विदेशों में अध्ययन के लिए जाते हैं इन्ही  छात्रों की फीस से विदेशी यूनिवर्सिटीयां चल रही हैं। यदि भारत मे उचित शिक्षा देने की व्यवस्था और ईनकी प्राप्त शिक्षा का उपयोग देश की प्रगति के लिए किया जाए नए नए आविष्कारों को नए उधोगो में उपयोग किया जाए तो देश का उत्पादन भी बढ़ेगा तथा नए नए रोजगार भी पैदा होंगे।इसके लिये  यूनिवर्सिटीज का उन्नयन करना होगा ,शिक्षा विद तैयार करने होंगे ,जो इस देश मे उपलब्ध है बस खोजना होगा ,देश को बढे बड़े उधोगपतियों का सहयोग लेना होगा ।आज भी विश्व की 12 विश्वस्तर की कंपनियों के CEO भारतीय हैं ,इनका भारत मे  उपयोग क्यों नही होता?                                                                                            ब्रिटेन में ----1,36921   जर्मनी में –-----34702                             फ्रांस में –-----8536        रूस में--------31444                               कनाडा में--42,7085      सिंगापुर में----17000                              ऑस्ट्रेलिया में --78093    अमेरिका में --3,31692            अर्थात 10,65,183 छात्र विदेशों में इंडिया टुडे के 18 जून 2025 के आंकड़ों के अनुसार पढ़ने के लिए जाते हैं।जिनकी सालाना फीस 40,000 डॉलर प्रति वर्ष होती है ।अर्थात करीब 42अरब रु हर साल देश के बाहर जा रहा है।इतने धन से तो इस देश मे सैंकड़ो यूनिवर्सिटी खुल सकती हैं।जिससे विदेश से  भी छात्र यहां पढ़ने आ सकते हैं ।और देश की इकॉनमी भी बढ़ सकती  है।

सोमवार, 24 मार्च 2025

लोकतंत्र पर पूंजीपतियों के कब्जा

 भारत मे 31%मध्यम वर्ग रहता है।13% निम्न वर्ग 52% निम्न मध्यम वर्ग और 4% उच्च वर्ग निवास करता है ।तथा इस देश मे 10 लाख से अधिक जनसँख्या के कुल 63 शहर हैं ।जिसमे 27% मध्यम वर्ग और 43% उच्च वर्ग के लोग निवास करते हैं।और देश का 27% खर्च इन्ही शहरों पर होता है ।तथा देश देश की कुल बचत का 38% हिस्सा भी इन्ही शहरों से आता है ।इनमे मध्यम वर्ग का इस देश के विकास में भी अहम भूमिका है । ये मध्यम वर्ग ही इस देश की GDP में 50% का हिस्सेदार है,देश के कुल खर्च में इस वर्ग की 48% हिस्सेदारी है ।देश की कुल बचत में 56% हिस्सेदारी भी इसी वर्ग की है ,इनकमटैक्स जनरेशन में भी 51% की हिस्सेदाई है                              इतना सब देने के बाद  किसी  की भी सरकार रही हो इस वर्ग के भविष्य के प्रति किसी ने कोई योजना नहीं बनाई।जबकि  उच्च वर्ग ,जिसकी आबादी 4% है तथा जिनका न तो जीडीपी में ,न खर्च में ,न बचत में कोई हिस्सेदारी है,उनके प्रति सरकारें सारी सुविधाएं देती रहीं हैं ।ये फर्क क्यों इस पर मध्यम वर्ग को आवाज उठानी चाहिए।                                                                                          दूसरी तरफ प्रति सांसद को प्रति वर्ष 27लाख तनख्वाह मिलती है,दूसरे भत्ते भी करीब 10 लाख तक के सालाना मिलते हैं ,इसी प्रकार विधायकों को मंत्रीयो कोभी इससे कुछ कम तनख्वाह और भत्ते मिलते हैं । जिन्हें सत्ता सुख भोगने के लिए वोट चाहिए इसके लिए कोई शैक्षणिक योग्यता की जरूरत नहीं ,इस सत्ता को पाने के लिए पूंजी और वोट चाहिए,पूंजी इन्हें उच्च वर्ग जिनकी संख्या 4% हैउनसे मिल जाती है ,और वोट इन्हें 13%निम्न वर्ग और 52% निम्नमध्यवर्ग के रेवड़ी के माध्यम से मिल जाता है ,इन्हें 31% मध्यम वर्ग और 4% उच्च वर्ग के वोट की जरूरत नहीं ।और यही वर्ग किसी सरकार से सन्तुष्ट नहीं होता ईसे सिर्फ आलोचना करनी है और गाल बजाना आता है । इसलिए राजनेतावों ने इन्हें पहचान लिया है इसलिए इस वर्ग कीं इन्हें जरूरत नहीं है ।इस प्रकार इस देश मे लोकतंत्र के नाम अघोषित राजतन्त्र कायम हो गया। जो पूर्व में क्षेत्रीय राजा शासन करते थे।वही स्थिति फिर से आ गई ।इन्हें न तो संविधान की परवाह है ,ये संविधान को अपनी सुविधानुसार स्वयं के हित के लिए उपयोग कर रहें है।गरीब वंचित वर्ग बना रहे तथा पूंजीपति वर्ग बना रहे यही इनका उधेश्य है।अर्थात पूंजीपतियों ने लोकतंत्र पर कब्जा कर लिया है जिस प्रकार ब्रिटेन में जॉर्ज पंचम द्वितीय के मरणोपरांत वहाँ के कुछ पूंजीपतियों ने अपने प्रतिनिधियों को वहां की संसद में भेज कर लोकतंत्र स्थापित किया और दुनिया के 167 देशों पर राज करके उनका शोषण किया वही स्थिति इस देश मे भी देखने को मिल रही है ।जब तक मध्यम वर्ग एक जुट हो कर निम्न वर्ग को साथ ले सड़क पर उतर कर जन आंदोलन नही करेगा इस व्यवस्था से निजात नहीं मिल सकती ।

सोमवार, 4 नवंबर 2024

लोकतांत्रिक देश मे रेवड़ी कल्चर

 पिछले लेख के आगे -----                                                         इस देश मे 86% चुने हुए सांसद, विधायक करोड़पति हैं ।इस से जाहिर होता है की चुनाव भी पूंजीपतियों की ग्रिफ़्त में आ गया ।साधारण आदमी के लिए चुनाव लड़ना असम्भव हो गया। जब चुनाव में करोड़ो रु खर्च करके कोई प्रतिनिधि सांसद या विधायक बनेगा तो पहले वह उसके द्वारा खर्च की गई राशि की वसूली उसके क्षेत्र के विकास के लिये आबंटित राशि मे से बतौर कमीशन वसूलेगा।तब क्या ये कमीशन खोरी जनसेवा है ?  इसलिए वोटरों की संख्या इतनी बढ़ाई जाये कि चुनाव के दिन वो बिक सकें  या लाभन्वित हो सके ताकि उनको प्रलोभन दे कर 5 साल तक राज कर सकें ।इन चुनावी प्रकिया के सुधार के लिए मेने कुछ सुझाव सोचे हैं , यदि इनको धरातल पर उतारा जाए तो इन कुरीतियो से बचा जा सकता है ।         देश के बुद्धिजीवी वर्ग को सरकार से ये मांग रखनी  चाहिए या सड़क पर उतर कर आंदोलन करके मजबूर करना चाहिए                1---राष्ट्रीय,प्रांतीय ,निगम व ग्रामीण चुनावों का संचालन और उसका खर्च सरकार को उठाना चाहिए ।                                               2--चुनाव के प्रतिनिधि का चुनाव उसकी शैक्षणिक योग्यता के आधार पर होना चाहिए,भले ही वह किसी भी जाति ,धर्म को हो ।      3--जुलूस,आमसभवों पर प्रतिबंध लगाना चाहिए ।TV डिबेट लोकल समाचारपत्रों के माध्यम से प्रचार और सीमित पोस्टर बैनर के माध्यम से प्रचार होना चाहिए जिसके खर्च सरकार वहन करे ।।          4--व्यक्तिगत संपर्क के लिए जिले के शहरों ,कॉलोनियों,मोहल्लों कम्युनिटी हाल ,स्कूल,धर्मशालों में दिन निर्धारित करके सिर्फ वोटरों को आमंत्रित कर के उनसे वार्तालाप  का आयोजन करके प्रतिनिधियों को बिना शोर शराबे के अपने अपने सुझावों को वोटरों    से आदान प्रदान करना चाहिए ।जिस प्रतिनिधि को सबसे अधिक स्वीकारता मिले उसे ही प्रतिनिधि घोषित किया जाना चाहिए सरकार को भी उसका पिछला आपराधिक रिकॉर्ड की जांच के आधार पर ही चुनाव लड़ने की अधिकारिता देनी चाहिए ।इस से चुनाव में होने वाले खर्च से निजात मिलेगी तथा भरस्टाचार पर लगाम लगेगी ।               जब लोकतंत्र पूंजीपतियों के अधीन होगा तब समता मूलक समाज की रचना असम्भव होगी।क्योंकि पूंजीवाद में समता शब्द गौण होता है ।समता मूलक समाज की अवधारणा समाजवादी विचार है। पूंजीवाद और साम्यवाद से मुकाबला करने के लिए समाजवाद का विचार प्रबुद्ध जनों के बीच पैदा हुवा ।यद्यपि इस पर भी कुछ परिवारों का एकाधिकार हो गया ।तथा इस विचार को सत्ता पाने का हथियार   बना लिया।लेकिन ये स्थाई नहीं रह सकता क्योंकि ये विचार पूंजी और तानाशाही के विरोध में पैदा हुवा है ।और चूंकि पूंजी और तानाशाही स्थाई किसी समाज मे नहीं रह सकती ,इस लिए समाजवादी सोच स्थाई रहेगा चूंकि इसमें पूंजी का प्रभाव गौण है इसलिए इसको धरातल पर लाने के लिए संघर्ष की जरूरत होती है ।और पूंजी संघर्ष करने वालों को रोकती है ,इसलिए इस विचार को टिकाऊ बनाने में समय लगेगा लेकिन ये विचार कभी गौण नहीं होगा ।क्रमश:

लोकतांत्रिक देश मे रेवड़ी कल्चर

 भारत जैसे विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश मे पिछले 10 वर्षों  से शासित पार्टी ने रेवड़ी नामक हथियार ईजाद किया है ।जिस देश का विश्व के गरीब देशों में 136वां स्थान हो उससे समझ मे आता है कि इस देश मे गरीबों की कितनी संख्या है ।पूरे यूरोप की जनसंख्या से दो गुनी जनसंख्या गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रही है ।इन गरीबों को एन चुनाव के एक या दो माह पहले फ्री राशन ,आवास ,बाथरूम,के नाम से नाम मात्र की राशि लाडली बहना जैसी घोषणाएं करके उनके वोट से सत्ता पर काबिज होने का जरिया बना लिया है ।देश का  56% मध्यम वर्ग जिसका देश की टोटल इनकम में 80% भागीदारी है उसे इन घोषनावों से कोई लाभ नहीं मिलता ।और  देश की 10% जनसंख्या जो खुशहाल है उनकी भागीदारी देश की इनकम में सिर्फ 4%है उन्हें सभी भौतिक सुविधाएं मिल रही हैं ।और देश का लगभग 1% पूंजीपति वर्ग जिसकी पूंजी प्रतिवर्ष बढ़ती ही जा रही है ।इससे साबित होता है कि  वर्तमान राजनीतिक पार्टियां इन पूँजीपतियों की सुविधा के लिए बहुसंख्यक गरीब जनता को रेवड़ी देकर गरीब ही बनाये रखना चाहती है ।तथा उसे नक्कारा भी बना रही है ताकि उन्हें साधारण जीविका का  प्रलोभन दे कर सत्ता में बने रहैं ।ये देश के भविष्य के लिए घातक साबित होगा देश पूंजीपतियों की ग्रिफ़्त चला जाएगा और विश्व पटल पर नाम मात्र के लिए लोकतांत्रिक देश कहलायेगा।इसके लिए देश के बुद्धिजीवी वर्ग को सड़क पर निकल कर इस गरीब ,वंचित जनता को जाग्रत करना होगा ।क्रमश:

गुरुवार, 25 जनवरी 2024

प्रकृति द्वारा मनुष्य की योग्यता और क्षमता का चयन ।

 अडोल्फ हिटलर के अनुसार ,प्रकृति व्यक्ति की प्रजनन क्षमता को कम नहीं करती अपितु वह तो उत्पन्न व्यक्ति के अस्वस्थ और नकारा होने पर नष्ट करती है ।अस्तित्व के संघर्ष में जो जिंदा बच गया प्रकृति उसका बार बार निरीक्षण ,परिछन करके समर्थ और योग्य बनाती है ।ताकि प्रजनन प्रक्रिया को जारी रखे ।योग्यतम के चुनाव की यह प्रक्रिया अनवरत जारी रहती है ,व्यक्ति के प्रति प्रकृति के इस व्यवहार से साफ होता है कि प्रकृति जाति और वर्गों की शक्ति की रक्षा करती है और उसे उत्कृष्टता की श्रेष्ठतम की सीढ़ी तक पहुँचा देती है ।।         प्रकृति के इस प्रकार के संबंध में संख्या में न्यूनता का अर्थ शक्ति का संवर्द्धन और आखिरकार जाति का उन्नयन निहित है ।यदि व्यक्ति स्वंय जनसंख्या को कम करना शुरू करदे तो मसला दूसरा होता है ।मनुष्य प्रकृति का स्थान कभी नहीं ले सकता ,क्योंकि उस की सीमा है ,उसमे योग्यता के चयन की क्षमता नहीं है ,वह तो केवल प्रजनन को रोक सकता है ।।                                                                  प्रकृति प्रजनन पर रोक नहीं लगती, हाँ पैदा हुए प्राणियों के हुजूम से श्रेष्ठतम का चुनाव जरूर कर लेती है ।और उसे जीवित रहने की मुहर जरूर लगाती देती है ।   

बुधवार, 19 जुलाई 2023

राजनीति का व्यवसायीकरण

 विश्व की आबादी के हिसाब से भारत सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश कहलाता है ,बल्कि लोकतंत्र का जनक भी कहलाता है ।लेकिन समय के साथ इस देश ने राजतंत्र  भी देखा और तानाशाही रूपी लोकतंत्र भी देखा ।विदेशी आक्रांताओं का शोषण तथा कदाचार भी देखा ।बहुत संघर्ष के बाद 1947 में इसी देश के गांधी,पटेल,नेहरू,गोखले,मालवीय,जैसे बुद्धिजीवी लोगों  के शांति पूर्ण ,अहिंसक आंदोलन से 170 साल पुराने अंग्रेजी शासन से आजादी दिलाई।तथा नया सविंधान बनाया और शपथ ली कि नए संविधान के अनुसार देश की प्रजा को उत्तम शासन से सहूलियत दी जाएगी ।यद्यपि देश ने कांग्रेस के शासन काल में खूब तरक्की की चाहे वो शिक्षा हो, स्वास्थ हो, विज्ञान हो ,उद्योग हो,लेकिन जनसंखया की व्रद्धि के साथ इसका सामंजस्य नही बैठा सके ।यद्यपि देश की शिक्षा संस्थाओं ने उच्चकोटि के इंजीनियर, डॉक्टर, वैज्ञानिक,तैयार किये लेकिन उनको  देश मे खपाने की व्यवस्था नहीं के सके ,जिसके कारण 90% ये ज्ञान विदेशों में चला गया और ये पलायन अभी भी जारी है। इसकी वजह जो मुझे समझ मेआई इसका कारण हमारे राजनेतिक वर्ग में इस ज्ञान के उपयोग का अभाव समझ मे आया ।जो राजनेतिक क्षेत्र सेवा का कहलाता था ,उसका व्यवसायीकरण हो गया ।चुनाव का खर्च बढ़ गया प्रचार का खर्च बढ़ गया ।जहां सरस्वती का वास होता है वहाँ लक्ष्मी का वास नही होता ये सनातनी कहावत यहां चरितार्थ होती है ।बुद्धिजीवियों ने राजनीति से तौबा करली और राजनीति में बाहुबली,पूंजीपतियों का पर्दापण हो गया,उनका उद्देश्य स्वयं को बनाना और स्थापित करना रह गया ।इन्होंने राजनीति को सेवा की जगह व्यवसाय बना लिया ।सायकिल पर चल कर पार्षद फार्च्यूनर में चलने लगा झोपड़ी को महलनुमा मकान बना लिया ।देश मे अमीरों की संख्या बढ़ने लगी ।गरीबो की संख्या बढ़ने लगी ,देश की 10%आबादी के पास देश की 77%संपत्ति पर कब्जा हो गया ।और ये पूंजीपति इस पूंजी को ले कर विदेशों में रहने और निवेश करने लगें।अर्थात के ईस्ट इंडिया  कंपनी बन गई ।आज भारत विश्व की 5वीं बड़ी अर्थव्यवस्था कहलाती है फिर भी 80 करोड़ लोगों को फ्री अनाज बांटा जा रहा है ।जबकि इस देश की 21% जनता ही शिक्षित है जो दुनिया के 40वैं पायदान पर  है । प्रति व्यक्ति आय की गणना की जाए तो भारत का दुनिया मे 142वा स्थान है जो अंगोला से भी कम है,जर्मनी,कनाडा की आय हमसे 20गुना यूके की 18गुना फ्रांस की 17 गुना अमरीका की 31 गुना हमारे पड़ोसी चाइना  जिसकी आबादी हमसे ज्यादा है 5 गुना ज्यादा है  इसकी वजह इस देश की राजनैतिक पार्टीयां सिर्फ अपने नेतावों को पोषित  करती हैं और स्वयं को राजगद्दी पर येन केन बैठे रहने के प्रयास में लगी रहती हैं।इसका  इलाज जनता को शिक्षित करना ,शिक्षित बुद्धिजीवी प्रतिनिधियों को उतारना होगा।जनता के चंदे से चुनाव लड़ना स्वयं के खर्च को घटाना ,प्रचार के तरीक़े को बदलना होगा। इसके बाद सत्ता में आने के बाद ज्ञान के पलायन को रोकना होगा ,जनभागीदारी की योजनाओं का जाल बिछाना होगा  देश के ज्ञान का उपयोग देश के उत्पादन में ही करना होगा ,देश मे लोकतंत्र तभी सफल होगा ।अन्यथा ये तथाकथित राजनेतावों के द्वारा शासित राजतन्त्र बन कर रह जायेगा ।

सोमवार, 8 मई 2023

भारत मे लोकतंत्र बनाम चुनावी राजतन्त्र।

 उपरोक्त विषय मे मेरा अपना सोचना है कि भारत मे लोकतांत्रिक प्रणाली इस देश की अपनी पोषित प्रणाली न हो कर एक थोपी हुई प्रणाली है जो कि यूरोप के बहुतायत देशों के द्वारा पोषित की गई है ।और उसे उनके द्वारा शासित देशों पर उनके खुद के स्वार्थ सिद्धि के लिए थोपी गई है ।नहीं तो जैसा मैंने 3 साल कनाडा में रह कर देखा और वहां के चुनावों के क्रियान्वयन को नजदीक से देखा तो पाया कि वहां जनप्रतिनिधियों का सम्मान तो है परन्तु उनको जनता द्वारा इतनी अहमियत नहीं दी जाती ।वहां का जनप्रतिनिधि चाहे वो  सांसद हो या विधायक उसका आवागमन ,रहनसहन आम जनता की तरह ही होता है ।उसे कोई विशेष अधिकार नही होते ,उसका काम जनता को सुविधा पहुंचाने के लिए उपयुक्त कानून बनाने तक ही सीमित रहते हैं ।उसके लिए उन्हें कोई पारितोषिक या तन्ख्वाह नहीं मिलती मीटिंग अटेंड करने का भत्ता भर मिलता है ।उनके रहने की व्यवस्था उनकी खुद की है ,उनके लिए आवासों का आबंटन होता है उसका किराया उन्हें स्वयं वहन करना पड़ता है शासकीय कामो के लिए वाहनों की व्यवस्था शासकीय रहती है,परन्तु स्वंय के उपयोग के लिए शासकीय वाहन वर्जित होते हैं ।।                         अर्थात वहां कानून का राज है न कि विधायिका का।उदाहरण के लिए मेने वहां मोंट्रियल में स्थित गांधीपार्क में गांधीजी की मूर्ति स्थापित करने के लिए आदरणीय श्री शरद यादव से अनुरोध करके तत्कालीन विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज के प्रयासों से जनवरी 2019 में गांधीजी की  आदमकद मूर्ति भिजवाई । जिसे पार्क में स्थापित करने के लिए वहां के कमिश्नर को कनाडा के प्रधानमंत्री श्री ट्रुडो से चुनाव प्रचार के दौरान हुई मुलाकात के समय मदद करने की विनती की तो उनका जवाब था कि वो कमिश्नर के कार्य क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं कर सकते ।क्योंकि वे कानून से बन्धे हैं।लिखने का मतलब वहां कानून और स्थापित नियमो का पालन होता है ।वहां कानून सर्वोपरि है न कि जनप्रतिनिधि, कानून और नियम को सर्वोपरि माना जाता  है।व्यवहारिक तौर पर तो यहां भी कानून का राज है लेकिन व्यवहारिकता कुछ अलग है ।।              इसकी जब समीक्षा की तो महसूस किया कि इस देश की जीवन प्रणाली व्यक्ति प्रधान रही है ।त्रेता युग मे रामराज था जहां श्री राम जनता के बीच सर्वमान्य राजा थे उनको मर्यादापुरुषोत्तम की उपाधि से सम्मानित किया गया ।क्योंकि उनका आचरण वैसा था ।दूसरी तरफ द्वापर युग मे श्री कृष्ण पूजित हुए जो मर्यादा तोड़ू कहलाये ।परन्तु धर्म रक्षक के रूप में अवतरित हुए,पापियों, दुराचारियों के लिए विध्वंशक के रूप में अवतरित हुए।अर्थात दोनों युग व्यक्ति पूजक रहे ।इसीप्रकार वर्तमान कलयुग में भी चक्रवर्ती राजावों के रूप में चाहे नन्द वंश हो या मौर्य वंश, मुगलवंश या अंग्रेजी शासन इसमें आखरी का अंग्रेजी शासन के पहले व्यक्ति विशेष ने ही राज किया ।चाहे हर्षवर्धन हो अशोक हो चन्द्रगुप्त हो अकबर और औरंगजेब हो ।शायद इसीलिए वर्तमान प्रणाली में राजनीतिक पार्टियां किसी न किसी परिवार के द्वारा संचालित हो रही हैं या किसी वर्ग विशेस के संगठन के द्वारा ।देश के केंद्र के नेतृत्व के लिए चेहरे को प्रधानता दी जा रही है और अब राज्य स्तर पर भी चेहरे को प्रमुखता दी जा रही है ।इस सब को देख कर मुझे ये एक अनुवांशिक गुण या बीमारी लगती है ।इस देश के या महाद्वीप में जिसमे व्यक्ति पूजक की संख्या ज्यादा है वनस्पति जन प्रतिनिधि के  ।यद्यपि ब्रिटेन जिसने 167 देशों पर राज किया वी चार्ल्स द्वितीय के बाद राजा विहीन हो गया था ,तब राजतन्त्र को चलाने के लिए वहां के पूंजीपतियों के संघठनो ने इस  देश की बागडोर संभाली   जिसमे east india co और bey hudson जेसी पूंजीपति सोच की कंपनियों के प्रतिनिधि यों की सलाह पर लोकतांत्रिक प्रणाली को ईजाद किया ।जिसमें इनका पूंजीवादी हित निहित था ।जिसमे एक राजा के स्थान पर बहुसंख्यक राजावों(जनप्रतिनिधि) को अपनी पूंजी की मदद से चुनवा कर अपना हित साधा जा सके।इसे या तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शासन करने का षड्यंत्र समझलो या सर्वमान्य शासन प्रणाली । कमियां तो हर प्रणाली में मिलेंगी परन्तु उन खामियों का प्रतिशत नापने के मापदंड होना चाहिए जो इस प्रणाली में भी होगा परन्तु व्यवहार में दिखता नही है ।                                                                           फिर भी इस प्रणाली में जिन जिन देशों ने इस के चार स्तम्भों में सबसे मजबूत कानून के स्तंभ का पालन किया उस देश की जनता सुखी है ।क्योंकि कानून सर्वोपरि है और उसका अनुपालन कराने वाले जनप्रतिनिधियो का हस्तक्षेप नगण्य है ,परन्तु जो देश पुरातन राजतन्त्र से पोषित हुवा है, उस देश मे कानून के ऊपर इंसान विशेष प्रधान रहा हो वहां लोकशाही का सफल होना सन्देहास्पद।जो कि वर्तमान में इस देश मे देखा जा रहा है।कानून का भी बंटवारा हो गया व्यक्ति विशेष के लिए अलग और साधारण व्यक्ति के लिए अलग।इसे निष्पक्ष कानून प्रणाली नहीं कह सकते।इन्ही विशेष सुविधाओं की आकांछा रखनेवाले  पूंजीपति, बाहुबली देश की अधिकांश गरीब ,अनपढ़ जनता को लालच ,डर ,आंतक के दम पर चुनाव जीत कर जनप्रतिनिधि का चोला पहन कर लोकतांत्रिक प्रणाली में उल्लेखित सुविधाओं का उपभोग कर रहे हैं ।ओर भोली भाली जनता को जूठे सब्जबाग ,फ्री की रेवड़ी बाँट कर जो उन्ही से टैक्स के रूप में वसूली जा रही है  जनता को निकम्मी बनाया जा रहा है, जिसमे हमारी पुरातन सभ्यता के अंश जैसे स्वाभिमानी, सवाबलम्बन जेसे शब्द सिर्फ शब्दकोश में कैद हो कर रह गए ।