सोमवार, 4 नवंबर 2024

लोकतांत्रिक देश मे रेवड़ी कल्चर

 पिछले लेख के आगे -----                                                         इस देश मे 86% चुने हुए सांसद, विधायक करोड़पति हैं ।इस से जाहिर होता है की चुनाव भी पूंजीपतियों की ग्रिफ़्त में आ गया ।साधारण आदमी के लिए चुनाव लड़ना असम्भव हो गया। जब चुनाव में करोड़ो रु खर्च करके कोई प्रतिनिधि सांसद या विधायक बनेगा तो पहले वह उसके द्वारा खर्च की गई राशि की वसूली उसके क्षेत्र के विकास के लिये आबंटित राशि मे से बतौर कमीशन वसूलेगा।तब क्या ये कमीशन खोरी जनसेवा है ?  इसलिए वोटरों की संख्या इतनी बढ़ाई जाये कि चुनाव के दिन वो बिक सकें  या लाभन्वित हो सके ताकि उनको प्रलोभन दे कर 5 साल तक राज कर सकें ।इन चुनावी प्रकिया के सुधार के लिए मेने कुछ सुझाव सोचे हैं , यदि इनको धरातल पर उतारा जाए तो इन कुरीतियो से बचा जा सकता है ।         देश के बुद्धिजीवी वर्ग को सरकार से ये मांग रखनी  चाहिए या सड़क पर उतर कर आंदोलन करके मजबूर करना चाहिए                1---राष्ट्रीय,प्रांतीय ,निगम व ग्रामीण चुनावों का संचालन और उसका खर्च सरकार को उठाना चाहिए ।                                               2--चुनाव के प्रतिनिधि का चुनाव उसकी शैक्षणिक योग्यता के आधार पर होना चाहिए,भले ही वह किसी भी जाति ,धर्म को हो ।      3--जुलूस,आमसभवों पर प्रतिबंध लगाना चाहिए ।TV डिबेट लोकल समाचारपत्रों के माध्यम से प्रचार और सीमित पोस्टर बैनर के माध्यम से प्रचार होना चाहिए जिसके खर्च सरकार वहन करे ।।          4--व्यक्तिगत संपर्क के लिए जिले के शहरों ,कॉलोनियों,मोहल्लों कम्युनिटी हाल ,स्कूल,धर्मशालों में दिन निर्धारित करके सिर्फ वोटरों को आमंत्रित कर के उनसे वार्तालाप  का आयोजन करके प्रतिनिधियों को बिना शोर शराबे के अपने अपने सुझावों को वोटरों    से आदान प्रदान करना चाहिए ।जिस प्रतिनिधि को सबसे अधिक स्वीकारता मिले उसे ही प्रतिनिधि घोषित किया जाना चाहिए सरकार को भी उसका पिछला आपराधिक रिकॉर्ड की जांच के आधार पर ही चुनाव लड़ने की अधिकारिता देनी चाहिए ।इस से चुनाव में होने वाले खर्च से निजात मिलेगी तथा भरस्टाचार पर लगाम लगेगी ।               जब लोकतंत्र पूंजीपतियों के अधीन होगा तब समता मूलक समाज की रचना असम्भव होगी।क्योंकि पूंजीवाद में समता शब्द गौण होता है ।समता मूलक समाज की अवधारणा समाजवादी विचार है। पूंजीवाद और साम्यवाद से मुकाबला करने के लिए समाजवाद का विचार प्रबुद्ध जनों के बीच पैदा हुवा ।यद्यपि इस पर भी कुछ परिवारों का एकाधिकार हो गया ।तथा इस विचार को सत्ता पाने का हथियार   बना लिया।लेकिन ये स्थाई नहीं रह सकता क्योंकि ये विचार पूंजी और तानाशाही के विरोध में पैदा हुवा है ।और चूंकि पूंजी और तानाशाही स्थाई किसी समाज मे नहीं रह सकती ,इस लिए समाजवादी सोच स्थाई रहेगा चूंकि इसमें पूंजी का प्रभाव गौण है इसलिए इसको धरातल पर लाने के लिए संघर्ष की जरूरत होती है ।और पूंजी संघर्ष करने वालों को रोकती है ,इसलिए इस विचार को टिकाऊ बनाने में समय लगेगा लेकिन ये विचार कभी गौण नहीं होगा ।क्रमश:

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