सोमवार, 8 मई 2023

भारत मे लोकतंत्र बनाम चुनावी राजतन्त्र।

 उपरोक्त विषय मे मेरा अपना सोचना है कि भारत मे लोकतांत्रिक प्रणाली इस देश की अपनी पोषित प्रणाली न हो कर एक थोपी हुई प्रणाली है जो कि यूरोप के बहुतायत देशों के द्वारा पोषित की गई है ।और उसे उनके द्वारा शासित देशों पर उनके खुद के स्वार्थ सिद्धि के लिए थोपी गई है ।नहीं तो जैसा मैंने 3 साल कनाडा में रह कर देखा और वहां के चुनावों के क्रियान्वयन को नजदीक से देखा तो पाया कि वहां जनप्रतिनिधियों का सम्मान तो है परन्तु उनको जनता द्वारा इतनी अहमियत नहीं दी जाती ।वहां का जनप्रतिनिधि चाहे वो  सांसद हो या विधायक उसका आवागमन ,रहनसहन आम जनता की तरह ही होता है ।उसे कोई विशेष अधिकार नही होते ,उसका काम जनता को सुविधा पहुंचाने के लिए उपयुक्त कानून बनाने तक ही सीमित रहते हैं ।उसके लिए उन्हें कोई पारितोषिक या तन्ख्वाह नहीं मिलती मीटिंग अटेंड करने का भत्ता भर मिलता है ।उनके रहने की व्यवस्था उनकी खुद की है ,उनके लिए आवासों का आबंटन होता है उसका किराया उन्हें स्वयं वहन करना पड़ता है शासकीय कामो के लिए वाहनों की व्यवस्था शासकीय रहती है,परन्तु स्वंय के उपयोग के लिए शासकीय वाहन वर्जित होते हैं ।।                         अर्थात वहां कानून का राज है न कि विधायिका का।उदाहरण के लिए मेने वहां मोंट्रियल में स्थित गांधीपार्क में गांधीजी की मूर्ति स्थापित करने के लिए आदरणीय श्री शरद यादव से अनुरोध करके तत्कालीन विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज के प्रयासों से जनवरी 2019 में गांधीजी की  आदमकद मूर्ति भिजवाई । जिसे पार्क में स्थापित करने के लिए वहां के कमिश्नर को कनाडा के प्रधानमंत्री श्री ट्रुडो से चुनाव प्रचार के दौरान हुई मुलाकात के समय मदद करने की विनती की तो उनका जवाब था कि वो कमिश्नर के कार्य क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं कर सकते ।क्योंकि वे कानून से बन्धे हैं।लिखने का मतलब वहां कानून और स्थापित नियमो का पालन होता है ।वहां कानून सर्वोपरि है न कि जनप्रतिनिधि, कानून और नियम को सर्वोपरि माना जाता  है।व्यवहारिक तौर पर तो यहां भी कानून का राज है लेकिन व्यवहारिकता कुछ अलग है ।।              इसकी जब समीक्षा की तो महसूस किया कि इस देश की जीवन प्रणाली व्यक्ति प्रधान रही है ।त्रेता युग मे रामराज था जहां श्री राम जनता के बीच सर्वमान्य राजा थे उनको मर्यादापुरुषोत्तम की उपाधि से सम्मानित किया गया ।क्योंकि उनका आचरण वैसा था ।दूसरी तरफ द्वापर युग मे श्री कृष्ण पूजित हुए जो मर्यादा तोड़ू कहलाये ।परन्तु धर्म रक्षक के रूप में अवतरित हुए,पापियों, दुराचारियों के लिए विध्वंशक के रूप में अवतरित हुए।अर्थात दोनों युग व्यक्ति पूजक रहे ।इसीप्रकार वर्तमान कलयुग में भी चक्रवर्ती राजावों के रूप में चाहे नन्द वंश हो या मौर्य वंश, मुगलवंश या अंग्रेजी शासन इसमें आखरी का अंग्रेजी शासन के पहले व्यक्ति विशेष ने ही राज किया ।चाहे हर्षवर्धन हो अशोक हो चन्द्रगुप्त हो अकबर और औरंगजेब हो ।शायद इसीलिए वर्तमान प्रणाली में राजनीतिक पार्टियां किसी न किसी परिवार के द्वारा संचालित हो रही हैं या किसी वर्ग विशेस के संगठन के द्वारा ।देश के केंद्र के नेतृत्व के लिए चेहरे को प्रधानता दी जा रही है और अब राज्य स्तर पर भी चेहरे को प्रमुखता दी जा रही है ।इस सब को देख कर मुझे ये एक अनुवांशिक गुण या बीमारी लगती है ।इस देश के या महाद्वीप में जिसमे व्यक्ति पूजक की संख्या ज्यादा है वनस्पति जन प्रतिनिधि के  ।यद्यपि ब्रिटेन जिसने 167 देशों पर राज किया वी चार्ल्स द्वितीय के बाद राजा विहीन हो गया था ,तब राजतन्त्र को चलाने के लिए वहां के पूंजीपतियों के संघठनो ने इस  देश की बागडोर संभाली   जिसमे east india co और bey hudson जेसी पूंजीपति सोच की कंपनियों के प्रतिनिधि यों की सलाह पर लोकतांत्रिक प्रणाली को ईजाद किया ।जिसमें इनका पूंजीवादी हित निहित था ।जिसमे एक राजा के स्थान पर बहुसंख्यक राजावों(जनप्रतिनिधि) को अपनी पूंजी की मदद से चुनवा कर अपना हित साधा जा सके।इसे या तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शासन करने का षड्यंत्र समझलो या सर्वमान्य शासन प्रणाली । कमियां तो हर प्रणाली में मिलेंगी परन्तु उन खामियों का प्रतिशत नापने के मापदंड होना चाहिए जो इस प्रणाली में भी होगा परन्तु व्यवहार में दिखता नही है ।                                                                           फिर भी इस प्रणाली में जिन जिन देशों ने इस के चार स्तम्भों में सबसे मजबूत कानून के स्तंभ का पालन किया उस देश की जनता सुखी है ।क्योंकि कानून सर्वोपरि है और उसका अनुपालन कराने वाले जनप्रतिनिधियो का हस्तक्षेप नगण्य है ,परन्तु जो देश पुरातन राजतन्त्र से पोषित हुवा है, उस देश मे कानून के ऊपर इंसान विशेष प्रधान रहा हो वहां लोकशाही का सफल होना सन्देहास्पद।जो कि वर्तमान में इस देश मे देखा जा रहा है।कानून का भी बंटवारा हो गया व्यक्ति विशेष के लिए अलग और साधारण व्यक्ति के लिए अलग।इसे निष्पक्ष कानून प्रणाली नहीं कह सकते।इन्ही विशेष सुविधाओं की आकांछा रखनेवाले  पूंजीपति, बाहुबली देश की अधिकांश गरीब ,अनपढ़ जनता को लालच ,डर ,आंतक के दम पर चुनाव जीत कर जनप्रतिनिधि का चोला पहन कर लोकतांत्रिक प्रणाली में उल्लेखित सुविधाओं का उपभोग कर रहे हैं ।ओर भोली भाली जनता को जूठे सब्जबाग ,फ्री की रेवड़ी बाँट कर जो उन्ही से टैक्स के रूप में वसूली जा रही है  जनता को निकम्मी बनाया जा रहा है, जिसमे हमारी पुरातन सभ्यता के अंश जैसे स्वाभिमानी, सवाबलम्बन जेसे शब्द सिर्फ शब्दकोश में कैद हो कर रह गए ।

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