शनिवार, 27 अगस्त 2022

तीसरे विश्व युद्ध की और यूरोप

 दुनियां की दो बड़ी शक्तियां अपने आप को  सुपर पावर बताने की होड़ में दुनिया को युद्ध जैसी विभीषका में झोंकने की और प्रयास रत्त हैं ।कोरोना की महामारी से उबर नहीं पाये थे और अब रूस यूक्रेन युद्ध पिछले 6 माह से चल रहा है जिसमे यूक्रेन को मोहरा बना कर अमरीका और रूस अपने हथियारों के प्रदर्शन की होड़ में लगे हैं ।दूसरी तरफ चाइना ,ताइवान को कब्जाने तयारी में लगा है ।ये सारी शक्तियां उस देश पर हमला नहीं करती जो परमाणु सम्पन्न है ।ये सब सोची समझी रन नीति के तहत ये चाल चलते हैं इससे निरीह जनता गरीबी और असमंजस की जिंदगी जीने को मजबूर हॉती। है इस प्रकार के संकट के हल के लिए UNO  निरीह बना तमाशा देख रहा है ये संस्था भी इन सुपर पावर देशों के प्रभाव में कोई निर्णय नही लेता तब इसका औचित्य क्या है ।मानवता और सम्मान पूर्वक जीवन जीने का अधिकार देने वाला समाज मूक दर्शज बना देख रहा है ।ऊपर से प्राकृतिक आपदा से दुनिया के संपन्न देश ग्रषित है इंसान का जीवन आर्थिक रुप से  टूट गया है उसकी भरपाई के लायक सरकारों के पास साधन नही बचे ।इसे प्रकृति का आक्रोश या प्रलय नहीं तो क्या कहेंगे ।विश्व बिरदारी के पुराधावों को एक आपातकाल मीटिंग बुला कर विश्व शांति का प्रयास करना चाहिए।दुनिया के पूंजीपतियों को विचार करना चाहिये जब मानवता ही नही बचेगी तो इस संचित  पूंजी का क्या उपयोग ।वक्त का तगादा है विश्व की महा शक्तियॉ के बीच सुलह कराई जाए और दोषी राष्ट्र पर बंदीश लगाई जाए या उसे UNO ,WTO से बाहर किया जाए ।तथा उसके प्राक्रतिक संसाधनों  के दोहन पर प्रतिबंध लगा कर मानव हित मे अंतरराष्ट्रीय संस्था के नेतृव में उत्पादन और वितरण की व्यवस्था की जाए अन्यथा विश्व एक विश्व व्यापी संकट के चक्र में फंसता जाएगा  

सोमवार, 18 जुलाई 2022

एक और क्रांति की ज़रूरत

 इस देश में मुख्यतः तीन क्रांतियां हुई है , जिनका आधार जनता के बीच दबा हुआ गुस्सा था।  गुस्सा उनके साथ हो रहे अत्याचार जो कुछ दीखता था और कुछ छुपा हुआ था।  विद्रोह छुपे हुए अत्याचार के कारण किसी एक व्यक्ति के अनुभव एवम उसकी सहनशक्ति की सीमा को लांघने के कारण हुआ।  पहेली क्रांति १८५७ में सापेक्ष अत्याचार की अपेक्छा एक बोने से अत्याचार [बन्दूक की गोली में गाय के मांस का उपयोग] के कारण प्रशासन से विद्रोह के रूप में मंगल पांडेय ने शुरू की थी।  जो देश के कोने-२ में फैल गयी , यदि यह व्यवस्थित तरीके से संचालित होती तो देश १८५७ में ही आज़ाद हो जाता।  परन्तु यह शासन की भागेदारी से वंचित और उपेक्छित वर्ग के द्वारा संचालित थी और उपेक्षित शासको का स्वार्थ निहित था ,जिसके कारण यह क्रान्ति सफल नहीं हो पायी। 

दूसरी क्रान्ति १९४२ में गांधीजी के कारण शुरू हुई , पचासी साल के लम्बे अंतराल के बाद साऊथ अफ्रीका में उनके साथ अंगेजो द्वारा किये गए अपमान से उत्पन्न गुस्से के कारण बदले की भावना से इस क्रान्ति का उदय हुआ।   किसी हद्द तक यह क्रांति सफलतम की श्रेणी में गिनी जाएगी।  क्योकि इसमें निजी स्वार्थ निहित नहीं था , यह व्यवस्थित भी थी क्योकि जन समुदाय एक व्यक्ति के पीछे था , और आक्रोश का प्रदर्शन कुछ अन्य हाथो में था।  इनके मिलेजुले प्रभाव से क्रान्ति सफल रही, परन्तु निष्कंटक प्रशासन और भौतिक सुख ने इस प्रतिवर्तन को  तानाशाही प्रवर्ति का रुप दे दीया। सामूहिक नेतृत्व एकल में केंद्रित हो गया , जो धीरे-२ जनता से संवादहीनता में परिवर्तित होता गया और तानाशाही की और अग्रसर होने लगा , जिसका परिणाम ३२ साल बाद १९७४ में श्री जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रान्ति के रूप में प्रकट हुई। यह तीसरी क्रांति हुई।   

चूकि यह क्रान्ति एकल तानाशाही के विरुद्ध एक व्यक्ति द्वारा लड़ी गयी थी तथा इसमें दबंगो और छात्रों का साथ लिया  गया था , और सदियों से उपेक्छित वर्ग की भागेदारी ज्यादा थी , तथा परिवर्तन  के बाद सत्ता भी इन्ही के हाथो में आनी थी , इस लिए इस उपेक्छित वर्ग के सत्ता में आने के बाद जयप्रकाश जी द्वारा अपेक्छित क्रांति उनके जाने के बाद नेतृत्वहीन हो गयी , इस कारण जनहित, "समाजवाद" के नाम से सत्ता हासिल करके कुछ राज्यों में परिवारवाद में परिवर्तित हो गयी। 

अब चौथी क्रांति की जरुरत है।  समीक्षा की जाए तो दूसरी क्रान्ति  अधिक समय तक टिकाऊ रही क्योकि इसमें उद्देश्य शुद्ध एवम व्यापक था।  पहेली क्रांति ३ साल में बुझ गयी , दूसरी क्रांति ३२ साल तक जिन्दा रही , तीसरी ७ साल में भुजने लगी।  अब चौथी उम्मीद करता हूँ की युवाओं द्वारा आएगी जो HIGH-TECH होनी चाहिए।  यह व्यवस्था परिवर्तन की होनी चाहिए,  क्योकि शिक्षा का स्तर बढ़ा है , अपेक्षाएं बढ़ी है , सहनशक्ति शिक्षित वर्ग में कम होती है , अन्याय का प्रतिकार जल्द उपजता है , संभव है जल्द ही SILENT क्रांति होनी चाहिए जो BALLOT से ही आएगी।  इसमें दबंगो और तथाकथित "परिवारों" से निजाद मिलेगी। 

शुक्रवार, 10 जून 2022

लोकतंत्र बनाम हिन्दू राजशाही

 जिस देश को 700 साल मुगलों और  200 साल अंग्रजो की गुलामी से मुक्त कराने में महात्मा गांधी,नेहरू,सरदार पटेल ,सुभाषचंद्र बोस,और भगतसिंग जैसे सेनानियों के अथक प्रयासो से  खण्ड खण्ड भारत को अहिंसा के हथियार से आधुनिक हथियारों से लैस लुटेरों के चंगुल से बिना खून बहाये आजाद कराया ,और नेहरू के प्रयासों से हिन्दू राजशाही के आदी देश को यूरोप की आधुनिक लोकतांत्रिक प्रणाली से शासन करने की पध्दति को अपना कर विश्वपटल पर देश की उपस्थिति का जो प्रयास किया उसे आज के सत्ताधीश ध्वस्त करने का प्रयास कर रहे हैं ।।                                                          राजनीति जो सेवा का  क्षेत्र कहलाता है वो व्यापार होता जा रहा है ,जो एक बार चुन कर सत्ता का स्वाद चख लेता है उसकी ये विरासत बन जाती है ,उसका पूरा परिवार इस सत्ता सुख  को भोगने के लिए किसी भी प्रकार के आचरण करने में झिझकता नही है ।एक किस्म की पुरानी राजशाही की छाप राजनेतावों में परिलिक्षित होने लगी है ।विरोध के स्वर को दबाने के लिए सुचारू प्रशासन के लिए निमित संस्थावों  का उपयोग किया जाने लगा है ।देश की 48%गरीब और निरीह जनता को फ्री राशन बाँट कर एक नया लाभार्थी वर्ग बना दिया गया है जो इनको सत्ता में बिठाने का स्थायी जरिया बन गया है ।।    देश के बेरोजगार नवजवानों को रोजगार उपलब्धता की जगह मंदिर ,मस्ज़िद,हिन्दू,मुसलमान के झगड़ो में उलझा दिया है । चूंकि इनके पास कोई विज़न नहीं है  कोई योजना नहीं  देश को गरीबी ,बेरोजगारी से निजाद दिलाने के लिए सिर्फ स्वंय के सत्ता सुख के अलावा ,देश  की हालत श्रीलंका और बेनेजुवेला जैसी होती जा रही है।और तो ओर देश की सेना की ,रेलवे की भर्ती पिछले दो साल से रुकी है जवान बच्चों की उम्र निकलती जा रही है ,चाइना और रूस यूक्रेन जैसे देशों में सेना में भर्ती के लिए जवान मिल नहीं रहे इन्हें आफ़ग़ानिस्तान  जैसे देशों से जवानों को लेना पड़ रहा है ।और हमारे यहां भर्ती के लिए होड़ लगी है ।नेहरू ने जो उधोग लोगो को रोजगार देने के लिए सरकारी क्षेत्र में लगए थे जो सिर्फ रोजगार देने के लिए न कि मुनाफा कमाने के लिए उन्हें बेचा जा रहा है ।नवरत्नों को कोयले के भाव मे अपने करीबी उधोगपतियों को बेचा जा रहा है ,जो विरोध करता है उस पर ED और CBI का छापा डलवाया जा रहा है ।।        इसका एक मात्र उद्देश्य OBC ST/SC  का आरक्षण खत्म करना है किसी भी सरकार को तीन (स) शिक्षा,सुरक्षा, स्वास्थ्य पर ज्यादा खर्च करना चाहिए ये सरकार इन्ही क्षेत्रो में उदासीन है इसमें दो  क्षेत्रों  का बजट विश्व के किसी भी विकाशशील देशों से बहुत कम है ।जो सरकार अपने देश के नागरिकों को अच्छी शिक्षा अच्छा  सवास्थ्य नही दे सकती उसे सत्ता में रहने का  कोई अधिकार  नहीं ।।            जिस देश मे चार  चार मौसम,  उपजाऊ कृषि भूमि अथाह खनिज भंडार अनगिनत नदियां हों उस देश मे गरीबी देख कर देश के सत्ताधारियों की काबलियत पर सवाल उठना लाजमी है ।शिक्षा ओर स्वास्थ्य क्षेत्र का बजट घटाया जा रहा है प्राइवेट सेक्टर को बढ़ाया जा रहा है इस सेक्टर पर राजनेतावों और नॉकरशाहों का आधिपत्य है। महंगी शिक्षा और महंगा इलाज गरीबों के लिए अभिशाप बन गया  है।।                                                                                     खनिज संपदा में विकीवीडिया के सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक इस देश मे 2012 के आंकलन के अनुसार    अभ्र्क़ का विश्व  का सबसे बड़ा भंडार है ,आयरन और का तीसरा boxide का पांचवां और थोरियम का सबसे बड़ा भंडार है ।इन खनिजो का दोहन करके ओर परिष्कृत करके विश्व बाजार में बेच कर देश मे बहने वाली नदियों को जोड़ कर नहरों का जाल  बिछा कर ओर विधुत उत्पादन किया जाए तो कारखानों को प्रचुर मात्रा में बिजली और कृषि को जल की सुगम उपलब्धता से देश के युवाओं को रोजगार और किसान को खेती से भरपूर रोजगार प्राप्त हो सकता है ।परंतु दुर्भाग्य से जमीनों पर राजनीतिक सरंक्षण प्राप्त भूमाफियों का कब्जा है ,शिक्षा और स्वास्थ्य पर भी राजनेतावों का कब्जा है खनिज पर बड़े बड़े उधोगपतियों का जो किसी न किसी राजनीतिक पार्टियों से जुड़े हुए उनका कब्जा है अर्थात लोकतंत्र पर राजशाही काबिज हो गई आजादी के पहले की 630 रियासतें फिर से दूसरे रूप में जिंदा हो गई ।अधिकांश सांसद, विधायक ,बड़े नॉकरशाह पूरी व्यवस्था पर काबिज हो गए महसूस होता है, देश के DNA में ही राजशाही है।लोकतांत्रिक व्यवस्था के नाम पर देश की जनता के साथ छलावा हो रहा है ।ये लोकतांत्रिक प्रणाली उन्ही देशो में सफल हुई है जहां शिक्षा का स्तर शत प्रतिशत है।अशिक्षित देशों में लोकतंत्र शोषण का माध्यम बन गया है ।बिना शिक्षा और स्वास्थ पर खर्च को बढ़ाये लोकतंत्री प्रणाली सफल  होगी इसमे संसय है ।एक इंटरव्यू में ब्लिट्ज के संपादक करंजिया से कहा था अगर इंग्लैंड को देखे तो वह औपचारिक रूप से चर्च ऑफ इंग्लैंड से एफफिलिअटेड ,लेकिन वहां का समाज लोकतांत्रिक हैं ।दूसरी तरफ हम संवैधानिक रूप से लोकतांत्रिक हैं लेकिन हमारा समाज लोकतांत्रिक नहीं है ।हमारे देश की राजशाही व्यवस्था हिन्दू है, इसलिए हमें सक्रिय व सचेत रूप से समाज को लोकतांत्रिक बनाने की कोशिश करनी होगी ।इसीलिए राजमाता सिंधिया ने कहा था कि हमारी तपों भूमि  लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुकूल नहीं थी।इसके बावजुद नेहरूजी ने इस देश मे लोकतांत्रिक व्यवस्था का पौधा लगाया ।

बुधवार, 4 मई 2022

पेट्रोलियम लाबी

 विश्व के अर्थ तन्त्र की तीसरी लाबी पेट्रोलियम पदार्थ याने क्रूड ऑयल के उत्पादकों की है ।इस तेल के स्त्रोत मुख्यतया अरब,गल्फ देशों में है प्रकृति ने यही एक मुख्य खनिज इन देशों को बहुतायत में दे रखा है ।चूंकि इन देशों में लोकतंत्र नही के बराबर है इनके शासक मुगलकालीन खलिफावों के पास है,और इनके पास इतने संसाधन नहीं हैं कि वो इस खनिज को एक्स्प्लोर करके रिफाइन करके मार्केटिंग कर सके ,इसलिए इस कार्य को अमरीका के यहूदी पूंजीपतियों ने अपनी रिफाइनरी डाल कर इन देशों के नवाबों को खनिज तेल का मूल्य देकर रिफाइन तेल उधोग पर कब्जा कर लिया ।और OPEC जैसी संस्था बना कर इसके भाव ,सप्लाई,और उत्पादन पर एकाधिकार स्थापित कर लिया ।चूंकि विश्व के एक छोटे से भाग में ही इसकी उपलब्धता है और मांग ज्यादा है ,साथ मे इसके व्यापार की ट्रेडिंग करने के लिए अमेरिकन करेंसी की बाध्यता लगा रखी है ।इसलिए इस व्यापार पर भी अमेरिकन पूंजीपतियों का कब्जा है ।सिर्फ रूस एक मात्र देश है जहां इसका भंडार बहुतायत में है,जो विश्व की जरूरतों का 30%पूरा कर सकता है इनकी रिफाईनरी पर यहूदियों का  स्वामित्व नहीं है, इस देश को साम्यवादी बता कर उसे नीचा दिखाने का प्रयास किया जाता रहा है ।।                                इस प्रकार इन तीनो लॉबियों (फार्मा, हथियार, आयल) के द्वारा विश्व पर राज करने के लिए समय समय पर इनका उपयोग डर का माहौल पैदा करके किया जाता रहा है चूकि ये इतने साधन संपन्न हो चुके हैं कि आने वाले भविष्य का निर्धारण भी इन्ही के हाथों में रहेगा ।ये चाहें तो विश्व मे लोकतांत्रिक व्यवस्था लाएं या तानाशाही इनके चंगुल से निकलना असम्भव सा लगता है ।विज्ञान का उपयोग जन सुविधावों की जगह विनाश के लिए किया जा रहा है ।इस भौतिकवाद ने सामाजिक ताना बाना ध्वस्त कर दिया ,मानवता खत्म हो रही है ।परिवार टूट रहे हैं लोगों का ध्यान पूँजीनिर्माण और सुरक्षित जीवन की और ज्यादा हो गया है ।जब परिवार टूटेगा जो राज्य,देशऔर विश्व की धुरी कहलाती है जब वोही टूट जाएगी तो इस विश्व का क्या होगा ? समाप्त 

हथियार लाबी

 कोरोना वायरस की महामारी से पूरी दुनिया निजात पाने ही वाली थी कि रूस ने यूक्रेन पर हमला कर दिया ।रूस ने अपने पुराने हो चुके जंक खाते हथियारों का जखीरा खत्म करने के लिए तथा नए हथियारों के प्रदर्शन से दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश अमरीका को चुनोती देते हुए ,किसी समय USSR का हिस्सा रहा यूक्रेन जिसने नाटो की सदस्यता के लिए आवेदन किया था को सबक सिखाने के लिए आधुनिक हथियारों से हमला करके ये जितलाने का प्रयास किया कि हमारी बिल्ली हमी से म्याऊं ।की कहावत को चरितार्थ करते हुए इस देश की जनता को पलायन करने को मजबूर कर दिया।और दुनिया को दिखा दिया कि हम उन हथियारों के निर्माता हैं जिनकी तोड़ किसी के पास नही ।।                                             विचारणीय प्रश्न ये है कि ये परमाणु सम्पन्न देश उन्ही देशो पर हमला क्यो करते है जिनके पास एटमी हथियार नहीं हैं ये भी सोची समझी रणनीति है ।ये उन्ही देशों पर अपने हथियारों का प्रदर्शन करते हैं जो क्या तो गरीब हैं या विकासशील देश है ।ये देश इन सम्पन्न देशो के हथियारों की प्रयोगशाला बन गई हैं ।जैसे इराक,अफगानिस्तान,और अब यूक्रेन ।इन देशों के शासकों ने इन सम्पन्न देशों की शर्तों को मानने से इनकार कर दिया तो इन शासको सत्ताच्युत करने के लिए निरीह जनता पर प्रहार करके डर का माहौल पैदा कर दिया ।ताकि बाकी देश अपनी सुरक्षा मजबूत करने के लिए इन हथियार निर्माता देशों से हथियार खरीदें ।UNO जिसकी स्थापना इन गरीब देशों को न्याय दिलाने या सहायता के उधेश्य से की थी वो भी तमाशबीन बना देख रहा है याने इस पर भी इन्ही निर्मातावो का कब्जा है ।जिस तरह WHO फार्मा लॉबी के प्रभाव में है उसी प्रकार UNO भी हथियार लाबी के प्रभाव में है ।इस का अर्थ ये निकलता क्या तो हर देश परमाणु सम्पन्न बने या वो तमाम देश जो गरीब है विकासशील हैं उन्हें अपना अलग से संगठन बनाना चाहिए ताकि ऐसी परिस्थिति में एक जुट होकर उस आक्रमणकारियों का मुकाबला कर सके और उस देश का बहिष्कार करें ।नहीँ तो ये देश आधुनिक टेक्नोलॉजी के नाम पर नए हथियारों के नाम पर धन उगाहते रहेंगे और गरीब बने रहेंगे ।संगठन और संख्या में बहुत ताकत होती है उसका प्रदर्शन और उपस्थिति दर्ज कराए बिना ये हमले और शोषण इस हथियारलाबी का होता रहेगा ---क्रमशः--पेट्रोलियम लाबी 

3 लॉबियों की ग्रिफ्त में दुनिया 1 फार्मा लाबी

 1) फार्मा लॉबी :--फरवरी2020 में विश्व मे फार्मा लॉबी ने कोरोना वायरस फैला कर एक नई महामारी को ईजाद करके विश्व मे हड़कम्प मचा दिया । करोड़ों लोग इस बीमारी की ग्रिफ्त में आये, करोड़ो लोग मर भी गए ।लेकिन इस कि दवाई आज तक ईजाद नही हो पाई।इस बीमारी की दहशत ने लोगों को घरों में कैद कर दिया ।शहरों में लोकडाउन कर दिया गया ।जिनके पास जो भी जमा पूंजी थी उन्होंने इस बीमारी से बचने के लिए खर्च कर दी न पूंजी बची न मरीज ।इस वायरस ने पहले बूढ़ों को और बाद में  जवानों को और अब बच्चों को ग्रिफ्त में लेने की who द्वारा सूचित किया गया । इसके बचाव के लिए मास्क  ,पीपी किट,सैनिटाइजर का उपयोग जरूरी करके इस उधोग को  जो मरणासन्न पड़ा था उसको अम्रत पिला दिया ।इस बीमारी ने वो अस्पताल जो बन्द होने की कगार पर थे उन्हें हाई टेक बना दिया ।एक साल क़े  बाद इस वायरस की वेक्सीन ईजाद की गई उसे जरूरी बता कर करोड़ो का धन कमाया गया ।अर्थात फार्मा लॉबी ने वायरस का डर फैला कर पूरी दुनिया के अर्थ तन्त्र को बर्बाद कर दिया और खुद दशाब्दियों के लिए आबाद हो गया ।फार्मा क्षेत्र को छोड़कर बाकी सभी उद्योग दिवालियापन की हद तक पहुंच गए ।इस बीमारी से मरने वालों का तो आंकड़ा सरकारों के पास है ।लेकिन भुख और दिवालिया होने के डर से आत्महत्या करनेवालों का आंकड़ा इनके पास नही है।जिसका असर दो साल बाद अब दिखने लगा है ।इससे साबित होता है कि इन आंकड़ों की बाजीगिरी से जनता में भय का वातावरण निर्मित होगा जिससे लोग डॉक्टरों और अस्पतालो में जाएंगे और इनका व्यापार और बढ़ेगा।जिस तरह डर का दूसरा नाम भगवान है उसी तरह डॉक्टर का दूसरा नाम भगवान (डर) बन गया ।इन तमाम अंतरराष्ट्रीय फार्मा कंपनियों के मालिक बहुतायत में अमेरिकन (यहूदी व्यापारी)हैं और चीन में इनका उत्पादन होता है ।इन दोनों ने मिलकर इस वायरस को विश्व मे फैलाया और विश्व पर शासन करने का प्रयास किया ।वो तो अच्छा हुवा भारत के लोगों का भौगोलिक स्थिति प्राकृतिक मौसम और भारतीय खान पान की वजह से यहां के लोगों का इम्यून सिस्टम मजबूत था नही तो इस वायरस से करोड़ो जाने जाती ।सरकारों को चाहिए इस प्रकार की लाबी का भंडाफोड़ किया जाए ओर जन हित मे कार्य करने के लिए इन पर दबाव बनाया जाए ।ताकि भविष्य में कोई संस्था इस प्रकार का कुकृत्य करने के पहले सोचने को मजबूर किया जाए ।इसमे UNO को हस्तक्षेप करके WHO का पुनर्गठन किया जाए  का प्रस्ताव सभी सदस्य को देना चाहिए ।----अगली कड़ी --हथियार लाबी --

बुधवार, 26 जनवरी 2022

देश को सम्पन्न बनाने की परिकल्पना

 भारत जैसे बहुभाषी ,बहुध्रुवीय और विभिन्न भौगोलिक स्थितियों को ध्यान में रखते हुए इस देश मे सम्पन्नता की परिभाषा में एक रूपता नहीं पाई जाती । परन्तु अंतरराष्ट्रीय मापदण्डो को देखते हुए हम सम्पन्न राष्ट्र बनने की सम्भावनावों को तलाशने में चूक कर रहे हैं।जबकि हमारे पास सम्पन्न बनने के लिए भरपूर मात्रा में खेती लायक जमीन,भरपूर मात्रा में खनिज,प्रकाशऔर जल उपलब्ध है ।यह देश सदियों से कृषि प्रधान रहा है ,80% जनता कृषि पर आश्रित है,किसी भी कृषि प्रधान देश को सम्पन्न बनाने के लिए उस के लोगो की आकांक्षाओं को जाग्रत करने होगा ,उसे खेत से बाहर की दुनिया के विषय मे जाग्रत करना होगा ।वर्तमान जीवन यापन के अतिरिक्त भी एक सुनेहरी दुनिया के विषय मे बताना होगा ।जब उनकी आकांक्षा जागेगी तो वह उसी खेती से अतिरिक्त धन उपार्जन करने का प्रयास करेगा ।उसके द्वारा की जाने वाली खेती के तरीकों में बदलाव लाना होगा ,उत्पादन की मात्रा और क़्वालिटी को सुधारने के लिए बदलाव करने की सोच पैदा करनी होगी।इसमे सहकारिता से खेती भी एक सार्थक उपाय हो सकता जिनके पास कम जोत की खेती है ।इस अतिरिक्त प्रयास से उपार्जित धन से उसके पास अतिरिक्त पूंजी का संचय होगा और इसी संचित पूंजी से सम्पन्नता की राह निकलेगी ।।                    खनिज संपदा :------                                                                        दूसरा क्षेत्र किसी भी देश की खनिज सम्पदा उस देश की सम्पन्नता का दूसरा भागीदार होता है ।इस देश मे सभी प्रकार की खनिज सम्पदा भरपूर मात्रा में जमीन के नीचे दबी पड़ी है ,इसके दोहन के लिए धन और श्रम की जरूरत होती है जो इस देश मे प्रचुर मात्रा में है इस देश के मंदिरों के पास ही इतना धन है जितना दुनिया सबसे सम्पन्न राष्ट्र के पास भी नही होगा ।यदि इस धन का उपयोग इस खनिज के दोहन ओर उत्पादन के लिए कारखाने लगाने में किया जाए ,बशर्ते योजनाकार ईमानदार हो,तो पूंजी और श्रम की कमी नही आएगी।जिस क्षेत्र में जिस खनिज की उपलब्धता और उपयुक्तमात्रा हो उसका उत्पादन हेतु कारखानों का निर्माण भी उसी क्षेत्र में करना होगा ।आज टेक्नोलॉजी आसानी जे उपलब्ध है इसलिए उसके उपयोग से छोटे बड़े उधोग स्थापित किये जा सकते हैं ,उन कारखानो में युवा ग्रामीणों को रोजगार उपलब्ध होगा जो कृषि  की आमदनी के अतिरिक्त धन की आवक से परिवार में सम्पन्नता आएगी।अभी इन खनिजो का उपयोग उन क्षेत्रों में नही होता जहां से इसे निकाला जाता है ,इसके लिए स्थानीय सरकारों को निर्णय लेना होगा कि जो खनिज जहां उपलब्ध है उसका करखाना उसी क्षेत्र में लगे।जिससे क्षेत्रवार खेती और खनिज से उस क्षेत्र में सम्पन्नता आएगी।                     जल सम्पदा:------                                                                           भारत के कई राज्य जल की उपलब्धता में सम्पन्न हैं और कुछ राज्य जल विहीन है ,जलसम्पन्न राज्यों में बिजली का उत्पादन करके  प्रदेश को सम्पन्न बनाया जा सकता है ,उत्पादित  सरपल्स विधुत को पड़ोसी राज्यों कोबेच कर।इस उधोग में भी रोजगार उतपन्न होगा ।।                                                            सौरऊर्जा:------राजस्थान जैसे राज्य में 52'से55' तक तापमान जाता है मरुस्थली क्षेत्र है वहां पर सोलर प्लांट लगा कर विद्युत उत्पादन करके पड़ोसी राज्यों को बिजली बेचा जा सकता है।थार मरुस्थल में कैरेन इंडिया कंपनी ने तेल के 180 कुवोंकी खोज की थी ,जिनमे अथाह क्रूड ऑयल पाया गया उसके दोहन से आयात घटा कर विदेशी पूंजी बचाई जा सकती है तथा देश की जरूरत भी किसी हद तक पूरी की जा सकती है ।कई गल्फ राष्ट्र तो केवल इस तेल के भंडार के दम पर विश्व के संपन्न राष्ट्रों में गिने जातेहैं ।।                                                                           विन्डस एनेर्जी:------भारत दो महासागर और एक सागर के निकट स्थित है यदि इन समुद्रों के किनारों पर विन्डस एनर्जी का उत्पादन किया जाए तो यह राष्ट्र विद्युतक्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सकता  है।डेनमार्क जेसै छोटे देश समुद्र के अंदर मिलों तक पोल गड़ा कर विन्डस एनर्जी का उत्पादन कर सकता है तो हम क्योंनहीं? देश के राजनेतावों  और नॉकरशाहों में इच्छा शक्ति की जरूरत है राष्ट्रीयभावना जगाने की जरूरत है ।जब दुनिया की टॉप12 कंपनियों में सीईओ भारतीय हो सकते हैं इनकी बुद्धि का उपयोग हम क्यों नहीं कर सकते?                                                यदि उपरोक्त बिन्दुवों पर गंभीरता से अमल किया जाए तो कोई ताकत हमे सम्पन्न राष्ट्र की श्रेणी में आने से रोक नही सकती।जब देश की जनता सम्पन्न होगी तो राष्ट्र सम्पन्न होगा देश के लोग खुशहाल होंगे तो बुद्धि का पलायन रुकेगा देश की पूंजी देश मे रहेगी तो नए नए विकास के पायदान भी खलेंगे।