शुक्रवार, 10 दिसंबर 2021

तालिबान के अफगानिस्तान पर कब्जा

 तालिबान का अफगानिस्तान की चुनी हुई सरकार पर बंदूक की नोक पर कब्जा कर लिया मजबूरन राष्ट्रपति को देश छोड़ कर भागना पड़ा ।विश्व की एक मात्र शक्ति का 20 साल की लड़ाई के बाद उसके आधुनिक हथियारों को छोड़ कर पलायन ,औरतों पर कातिलाना हमला इस्लाम के नाम पर शरिया कानून का अपनी सुविधानुसार थोपने का प्रयास कुरान की आयतों का अपनी सुविधानुसार अनुपालन करवाने की जबर्दस्ती ,इस वैज्ञानिक युग मे आदिम युग का आगाह प्रदर्शित करती है ।।                    अफगानिस्तान के इतिहास की तरफ यदि गौर किया जाए तो ऐसा लगता है कि ये अशिक्षित लोगो के कबीलों का देश है ,जिन कबीलों में प्रकृति ने असीम प्राकृतिक संपदा खनिज के रूप में भंडारित है लेकिन यहां के वाशिंदे  इसका दोहन कर के सम्पन्नता प्राप्त करने के बजाय ताकत के दम पर इस्लाम के नाम पर इस्लामिक राज्य स्थापित करना चाहते हैं। जो आधुनिक युग की जीवन प्रणाली से मेल नहीं कहता ,इनके जुझारूपन,निडरता,ने विश्व की 3 महाशक्तियों को अपने ऊपर राज करने से रोका ।वो चाहे ब्रिटेन हो ,रुस हो या अमेरिका हो ।कोई भी महाशक्ति इन पर शासन नही कर सकी।गजनी जैसे छोटे से गांव से निकला वहां का खानाबदोश ,गुंडा भारत के सोमनाथ मंदिर को लूट लेता है ,खिलजी,दुर्रानी जैसे लूटेरे भारत पर हमला कर के इसकी संपत्ति लूट कर अफगानिस्तान ले जाते हैं ,उसके बाद भी वहां की जनता को शिक्षित करने का प्रयास नहीं करते ।                                                               इस तालिबानी कब्जे की घटना को देख कर नेस्तरोडेम की भविष्यवाणी जो तीसरे विश्वयुद्ध के विषय मे आज से 500 साल पहले की थी ,सच साबित होती दिख रही है ।ऐसा लगता है कि ये भविष्वाणी अफगानिस्तान की भूमि पर फ़लीभूत होगी।क्योंकि चीन ,रसिया ,ईरान  ने तालिबान को आंशिक मान्यता दे दी है ।दूसरी तरफ अमेरिका ,यूरोपियन देश इसका विरोध कर रहे हैं ।यदि युद्ध हुवा तो एक तरफ अफगानिस्तान के लड़ाके इसी देश की जमीन ,चीन की सेना रसिया के हथियार और ईरान का धन बाकी देशों की सेना से मुकाबला करेगी ।नेस्तरोडेम ने लिखा है कि हरे झंडे के नीचे लाल सेना उस देश की सेना पर हमला करेगी जिनका शुभ दिन रविवार है यानी ईसाई देशों पर इस्लाम के झंडे के नीचे चीन की सेना हमला करेगी ।और इस युद्ध मे भारी जन धन की हानि होगी और लंबे समय तक चलेगा ।और इस युद्ध की तबाही को रोकने के लिए वह देश जो दो महासागर और एक सागर के निकट बसा हुवा है जिसका शुभ दिन गुरुवार है ,बीच बचाव करके युद्ध समाप्त कराएगा ।और विश्व गुरु बन कर दुनिया मे अपनी अलग छवि बनायेगा। इस भविष्यवाणी को देखते हुए मुझे भारत ही वह देश समझ मे आता है जो दुनिया को नेतृत्व प्रदान करेगा 

बुधवार, 5 मई 2021

कोरोना वायरस का विश्व के आर्थिक जगत पर प्रभाव 5/4/2020

 विश्व पटल पर सार्वभौमिक सत्ता धारी ,सर्वशक्तिमान राष्ट्र का तमगा विलुप्त हो गया ।आज किसी भी राष्ट्र को विश्व का शक्तिशाली देश कहलाने का हक नही रहा ।अमरीका जैसा देश जो दुनिया का सबसे शक्तिशाली ,विकसित विश्व के अर्थ तंत्र की कुंजी जिसके पास होती थी ,चाहे जब किसी भी द्वीप के किसी भी राष्ट्र पर अपनी धौंस जमा देता था ।वह भी इस वायरस के आगे नतमस्तक हो कर हर मान गया ।सारी वैज्ञानिक तकनीक सारी औद्योगिक संपन्नता सारी आर्थिक शक्ति धूमिल हो गई । विश्व पटल पर चीन जैसे राष्ट्र आज विश्व पटल पर आर्थिक,औद्योगिक शक्ति के रूप में उभर कर आया है ।सैन्य शक्ति के रूप में भी उभर कर आया है ।यूरोप और अमेरिका की 129 कंपनियों का मालिक बन गया ।इस वायरस को पहले  विश्व मे फैलाया ,महामारी का नाम देकर प्रचार किया ,शेयर मार्केट में भूचाल लाया ,और गिरते हुए शेयर मार्केट से उन कंपनियों के के शेयर खरीदे जिन्होंने इस देश मे निवेश कर रखा था ।अब ये कंपनियां कभी भी चीन से अपना उत्पादन बन्द नही कर पाएंगी ।500 globle rich कंपनियों में से 129 कंपनियों पर चीन का कब्जा हो गया ।जबकि 2008 तक मात्र 8 कंपनियां पर चीन का कब्जा था ।आज अमरीका की 122 कंपनियों पर मालिकाना हक है ।अर्थात आज अमरीका को सैन्य बल ,हथियार बल के आधार पर विश्व का शक्तिशाली देश कहलाने का  हक खत्म हो गया ।परमाणु सम्पन्न राष्ट्र भी इस बीमारी से जूझने में सक्षम नही रह गए ।शक्तिशाली राष्ट्र की परिभाषा बदल गई ।दुनिया नये दौर की और जा रही है ।बायोलॉजिकल वॉर की शुरुआत चीन ने कर दी एक वायरस फेलावो ,लाखों लोगों की जान कुछ घण्टो में ले लो।न मिसाइल ,न टैंक न बम न परमाणु ताकत ,एक ऐसा हथियार जिसका विकल्प ढूंढने में सालों लगते हों उसका इस्तेमाल करो और उससे बचने के उपयोगी सामग्री का निर्माण करो निर्यात करो  और धन कमावो ।।      आर्थिक संपन्नता की हौड़ ने मानवता को शर्मशार कर दिया ।इतनी बड़ी महामारी पूरे विश्व मे फैली हुई है कि सभी देश बचाव की मुद्रा में आ गए ।जहां से फैली उसके विरुद्ध कोई आवाज उठाने वाला भी नही बचा ।उल्टे बीमारी फैलाने वाले से सहायता की मांग हो रही है ।राष्ट्रसंघ, क्या कर रहा है ,WHO, WTO जैसी संस्था मौन हैं सम्पन्न देश आर्थिक रूप से धराशायी हो रहे हैं ।और एक देश जिसने बीमारी फैलाई वो सम्पन्न हो रहा है ।क्या विडम्बना है कोई आवाज भी नही उठा रहा ।सब आत्म रक्षा में लगे हैं ।

इस्लाम और हिन्दुत्व का महत्व

  संदर्भ:---संस्कृति के चार अद्ध्याय।                                           स्वामी विवेकानंद ने इसकी व्याख्या इस प्रकार की है कि वेदांत ज्ञान का विषय  समझा जाता है जिसमे त्याग और वैराग्य की बातें अनिवार्य रूप से आती हैं ।किंतु इस्लाम मुख्यतः भक्ति का मार्ग है तथा हजरत मुहम्मद का पंथ ,देहदण्डन, सन्यासऔर वैराग्य को महत्व नही देता ।किंतु स्वामी जी की व्याख्या का वेदांत निवर्ती से मुक्त शुद्ध परवर्ती का मार्ग था एवम तात्विक दृष्टि सेइस्लाम की प्रवर्ति मार्ग से उनका विरोध नहीं था ।इसलिए उनका कहना था कि इस देश मे दोनों धर्म के लोगों को मिलकर एक हो जाना चाहिए क्योंकि वेदांती मस्तिष्क और इस्लामी शरीर के संयोग से जो धर्म खड़ा होगा वही विश्व में  सर्वोत्तम माना जायेगा ।

मंगलवार, 4 मई 2021

आरक्षण(Reservation)11/6/20

 आज सुप्रीमकोर्ट का आरक्षण के विषय मे फैसला आया कि आरक्षण पाना संविधान के मौलिक अधिकार की श्रेणी में नही आता ।इसलिए उस पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया।तथा उसे मद्रास हाइकोर्ट में अपील करने के लिए आवेदन करने का आदेश दिया ।      देश के आजाद होने के बाद संसद ने आरक्षण का बिल 10 वर्ष के लिए पास किया था ।कारण सनाढ्य वर्ग द्वारा कुछ जाती विशेष के लोगों को पिछले दशकों से प्रताड़ित किया जाना उनका शोषण करने उनको मानसिक ,सामाजिक ,आर्थिक रूप से प्रताड़ित करने उन जातियों को उच्च वर्ग के बराबर लाने के लिए आरक्षण का प्रावधान रखा गया था ।परंतु पिछले 70 वर्षों से ये आरक्षण की सुविधा इस वर्ग को मिलती जा रही है ।जिसका बहुसंख्यक वर्ग को फायदा नही मिला बल्कि इस बहुसंख्यक समुदाय का कुछ बाहुबली ,रौबदार लोगो ने इसका राजनेतिक लाभ उठाया और अपने परिवार ,नातेदार रिस्तेदारों तक इस कानून का फायदा पहुंचाया ।और अब यह आरक्षण उनको संसद,विधानसभा तक पहुंचने का हथियार बन गया     मेरा सुझाव है कि आरक्षण लागू रखा जाए लेकिन इसका स्वरूप बदला जाए ।इससे जातियों के आधार को खत्म किया जाए ।इसका पैमाना आर्थिक रखा जाए ।आर्थिक रूप से जो भी नागरिक कमजोर हो उसे शिक्षा मुफ्त दी जाए ,स्कूल से यूनिवर्सिटी तक कोई फीस न ली जाए ,हो सके तो ड्रेस भी फ्री की जाए ।आने जाने का खर्चा भी दिया जाए ।जीवनयापन के लिए न्यूनतम भत्ता भी दिया जाए ।लेकिन नॉकरी या व्यवसाय के लिए योग्यता का मेरिट तय किया जाए उसमे आरक्षण बिल्कुल नही दिया जाए ।आर्थिक संपन्नता और विपन्नता का एक स्केल तय किया जाय ।उसके आधार पर आरक्षण देना उचित होगा ।इसमे सवर्ण वर्ग,सम्पन्न वर्ग को भी कोई आपत्ति नही होगी ।इसमें सरकार का खर्च बढ़ेगा उसकी वसूली भी रिज़र्वेशन सेस लगा कर बजट में प्रावधान किया जा सकता है ,जब  तक कि यह तबका मैन स्ट्रीम में नही आ जाता ।यह भी गणना की जाए की देश मे अनुसूचितजाति, जनजाति की जनसंख्या कितनी है ।उनमें आर्थिक रूप से कितने परिवार कमजोर हैं ,इसीप्रकार सवर्णों में कितने परिवार गरीबी रेखा के नीचे है उनके आंकड़ों के आधार पर बजट बनाया जा सकता है ।

रविवार, 2 मई 2021

विश्व का सिरमौर बनने की कवायद 17-4-2020

 दो विपरीत विचारधारावों के देशों में विश्वशक्ति बनने की होड़ ने पूरे विश्व की मानव जाति को "कोरोना'' जैसी महामारी के संकट में दाल दिया ।अमरीका जैसा देश जो सैन्य और आर्थिक रूप से विश्व को अपना लोहा मनवाता था ,वो भी इस वायरस के सामने घुटने टेकने को मजबूर हो गया ।30 साल पहले तक आर्थिक रूप से विपन्न ,जनसंख्या बहुल, साम्यवादी राष्ट्र चीन ने अमरीका और यूरोपीय राष्ट्रों की पूंजी से पोषित कारखानों को अपने देश मे स्थापित करके दुनिया का इंडस्ट्रियल हब बन गया ।जनसंख्या की बहुलता और आर्थिक संपन्नता ने उसे विश्व का सिरमौर बनने की महत्वकांक्षा ने उसे बायोलॉजिकल वेपन बनाने को मजबूर कर दिया ।उसे नही मालूम था कि भस्मासुर बन कर किसी को जलाने का आशीर्वाद उसे ही जल देगा ।करोड़ो लोगो की जान लेने के बाद भी दुनिया के सामने मौत के आंकड़े छिपाने का प्रयास कर रहा है ।                                            दूसरा पहलू यह भी हैं कि कोरोना वार कहीं फार्मा कंपनियों और बीमा कंपनियों के द्वारा विश्व के आर्थिक तंत्र पर कब्जा करने की योजना तो नहीं? नही तो क्या कारण है कि वेक्सीन बनाने की योजना वायरस फैलने के पहले कैसे बनने लगी ।।                                     तीसरा पहलू यह है कि विश्व मे हथियारों की मांग कम हो जाने की वजह से तथा देशों में युद्ध के दुष्परिणाम भोगने के कारण आपसी बातचीत से समस्या के हल की बढ़ने की प्रवर्ति के कारण हथियार निर्मातावों द्वारा इस बायोलॉजिकल वेपन का इस्तेमाल करके भय का वातावरण निर्मित किया जाए ।।                                                     परन्तु इससे हासिल क्या हुवा ,बुजुर्ग आबादी तो अपने समय पर खत्म हो जाएगी ।लेकिन नवजात 5 से 10 साल की आबादी का तो भविष्य चौपट हो गया ।उनका घर से निकलना ,स्कूल जाना ,खेल के मैदान का सुना होना ,कंप्यूटर के सामने बैठकर पढ़ाई करने ,work from home से शारीरिक ,मानसिक बीमारियों का घेरना इस मानव जाति के उत्थान पर प्रहार कौन से भविष्य का निर्माण करेगा  ये विचारणीय प्रश्न है ।विश्व के सिरमौर  विकसित देशों द्वारा यदि ये बीमारी फैलाई  गई है तो इसमें नुकसान इन्ही का है ।अविकसित देश तो पहले से ही विपदा में हैं ,विकासशील देशों का जरूर ज़्यादा नुकसान होगा क्योंकि उनका विकास रुक जाएगा ।तब इन विकसित देशों का उत्पाद कौन खरीदेगा ।जब खरीददार नही होगा तो उत्पादक देशों का या टेक्नोलॉजी कौन खरीदेगा ।जब खरीदार नही होगा तो इन उत्पादक देशों का भविष्य तो और अंधकारमय हो जाएगा ।           पश्चिमी देशों में तो युवा पीढ़ी वैसे ही कम है और जो युवा पीढ़ी उन्हें उधोगों में निर्माण के लिए अविकसित  या विकासशील देशों से निर्यात होती थी वह रुक जाएगी जब काम करने वाले हाथ नही होंगे तो क्या मशीनों के दम पर वे अपना विकास कर पाएंगे ? आखिर मशीनों को चलाने के लिए युवा हाथ चाहिए ।                                    अतिविकसित होने की चाह ने पूरी मानव जाति को अंधकार में डाल दिया है।इन विकसित देशों की पूंजी का क्या होगा जब खर्च करने वाले नही होंगे ।इस कोरोना ने लोगो को घर मे कैद कर दिया ,बाजार बंद कर दिए ।खर्च करने की जगह नही बची ,जमा पूंजी लोग खा गए ।नई आमन्दनी बन्द हो गई तो इस विज्ञान से विकास की  अवधारणा विनाश में तब्दील हो जाएगी।                                           भारत जैसे बहुसंख्यक देश मे जिसमे सबसे ज्यादा रोजगार देने वाला असंघठित क्षेत्र जो बिना किसी शासकीय सहायता के अपनाजीवन यापन करता है तथा देश की जीडीपी का 50%हिस्सेदार है ,उसको घरों में कैद कर दिया गया तो इस महामारी से होने वाली मौतों से ज्यादा तो लोग भूख से मर जायेंगे ।67%युवा आबादी वाला देश यदि इस आबादी को रोजगार नही दे पाया तो अराजक स्थिति भी पैदा हो सकती है ।ये कोई सोची समझी चाल तो नही की कुछ पूंजीपति राष्ट्र बची हुई बड़ी आबादी को निरीह बना कर अपने उत्पादों को खपाने का प्रयास बची हुई सम्पन्न आबादी में करना चाहती हो ।देश के कर्णधारऔर सत्ताधारी वर्ग भी ऐसा लगता है कि वो भी इन पूंजीपतियों की साजिश में फंस गया है । जो इस महामारी को हल्के में हैन्डल कर रहा है ।एक साल पुराने अनुभव के बाद भी दूसरे हमले को संभाल नही पा रहा और अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षा की पूर्ति के लिए अधिक से अधिक सत्ता प्राप्त करने के उधेश्य की पूर्ति में लगा हुवा है ।और विपक्ष बीमारी, और इनकमटैक्स,सीबीआई के छापों के डर से विरोध के लिए सड़क पर नही उतर रहा ।दुनिया का सबसे बड़ा वेक्सीन उत्पादक राष्ट्र देश के नागरिकों को वैक्सीन नही लगा पा रहा ।जबकि 1 करोड़ लोगों को प्रतिदिन वैक्सीन इस देश मे लगाने का इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद है  1 माह में 30 करोड़ लोगों को वैक्सीन लगाई जा सकती है ।जिससे हम इस महामारी से 2 माह में निजात पा सकते हैं अभी सिर्फ शहरों को vaccinate करने की जरूरत है ।इसे यही रोक दिया तो गांवों में फैलने से रोका जा सकता है बस  इच्छाशक्ति की जरूरत है ।

शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021

सत्ता का स्वरूप

 पूरे विश्व की जनसंख्या की  15% आबादी यूरोप और अमरीका में बस्ती है ।जिसमे चीन और भारत मे 40% आबादी तथा अफ्रीका और मध्यपूर्व के इस्लामिक देशों 45% आबादी निवास करती है ।      परन्तु पूरे विश्व पर ये 15%आबादी वाले देश टेक्नोलॉजी के कारण अपनी आर्थिक नीतियों के पालन पर जोर डालते है ।विश्व का खनिज संपदा से भरपूर अफ्रीका सबसे पिछडॉ महाद्वीप माना जाता है ।मध्यपूर्व तेल संपदा के कारण सम्पन्न राष्ट्रों का छेत्र कहलाता है ।भारत मानव संपदा के कारण विकासशील राष्ट्रों में गिना जाता है ।   चीन साम्यवादी तानाशाही के कारण औद्योगिक राष्ट्र के रूप में जाना जाता है ।यूरोप और अमेरिका टेक्नोलॉजी और हथियारों के आधार पर दुनिया के विकसित देशों में गिने जाते हैं ।इस पर गहराई से विचार किया जाए तो कौन से देश किन देशों का शोषण कर रहें हैं तो लगता है कि बिना मानव संपदा ,बिना खनिज संपदा और बिना किसी संस्कृति के ये राष्ट्र दुनिया की 85%जनता का आर्थिक शोषण कर रहे हैं ।और विश्व  के सिरमौर बन कर दुनिया पर राज कर रहें है ।यदि अफ्रीका महाद्वीप,एशिया महाद्वीप, और मध्यपूर्व के देश मिलकर अपनी करेंसी  निकाल ले तो इनका शोषण बन्द किया जा सकता है ।इनका व्यापार अपनी मुद्रा में होने लग जाये तो यूरोप और अमरीका अपने आप इन राष्ट्रों के आगे नतमस्तक हो जाएंगे राष्ट्रों के बीच होने  वाले झगड़े जब बन्द हो जाएंगे तो इनसे हथियार कौन खरीदेगा तब इस विध्वंसक टेक्नोलॉजी को कौन अपनाएगा ।जो इनके विकास का पैमाना है ।

कोरोना वायरस 27 मार्च 2020

 आज पूरे विश्व मे ये वायरस महामारी बन गया है हजारो लोग मर रहे हैं।सम्पन्न देशों में इसका प्रकोप ज्यादा भयावह है।जो विज्ञान के पुरोधा और आर्थिक रूप से सम्पन्न देश भी इसके आगे घुटने टेकने को मजबूर हैं ।भारत मे अभी वैसी स्थिति नही आई है ।फिर भी देश के प्रधानमंत्री ने 21 दिन का कर्फ्यू  लगा दिया ।परन्तु कर्फ्यू लगने के बाद देश का मजदूर वर्ग जो शहर में निर्माण, सेवा आदि  कार्यो में लगे थे कर्फ्यू की परवाह न करते हुए सार्वजनिक आवागमन के साधन बन्द होने कारण पैदल ही अपने अपने राज्यों की और पलायन करने को मजबूर हो गए ।इन लाखो की भीड़ जिसमे गर्भवती महिलाएं,बूढ़े,बच्चे हजारो किलोमीटर की यात्रा पैदल, रिक्शा,ऑटो आदि से भूखे प्यासे अपने ग्रहों को निकल पड़े ।यह देख कर मुझे आभास हुवा की 72 साल की आजादी के बाद भी इस देश की जनता को इस देश के तंत्र पर भरोसा नही रहा ।इन्हें अपने नेतावों अफसरों पर भरोसा नही रहा।जवान ,बूढ़े,बच्चे 100,200,400,किलोमीटर तक पैदल निकल पड़े ।ये जाहिर करता है कि जनता को अपने शासक पर भरोसा नही रहा।देश के बंटवारे के समय तो लोग बैलगाड़ियों से आते जाते रहे इस बार तो वो साधन भी नही रहा। अफसोस आजादी के बाद मेरे देश का मजदूर वर्ग अपने आप को जिंदा रखने के लिए अपने अपने गांवों को पलायन करने पर उतारू हो गया ।आखिर देश का शासक वर्ग किसके लिए सत्ता पर आसीन है ।।                                                                            लाखो मजदूर वर्ग का शहरों से गांवों की और पलायन करने वो भी कोरोना महामारी के बजाय जिंदा रहने के लिए ।स्वयं के अस्तित्व को बचाने के लिए हजारो किलोमीटर भूखे प्यासे बिना पैसे के अपने पैतृक गांव के लिए निकलना ये इस देश विभिन्न प्रान्तों की सरकारों की कार्यशैली और विस्वास पर प्रश्नचिन्ह लगाता है ।नही तो क्या कारण है lock down लगाने के दो दिन बाद ही पलायन शुरू हो गया । जिनके मातहत ये मजदूर काम करते थे उन्होंने बिना भत्ते के भगा दिया ।उन्होंने इनके रहने,खाने,पीने की कोई चिंता नही की ।सरकार ने भी घोषणा करने के पहले ये नही सोच इस असंगठित मजदूर कामगार वर्ग का क्या होगा ।।                                          प्राकृतिक आपदा में जब  सरकार पूंजीपतियों ,उधोगपतियों की सहायता के लिए आर्थिक सहायता का प्रोविजन करती है तो इनके लिए क्यों नही ? जिन संस्थावों में या फर्मो में ये मजदूर काम करते थे उन्हें,इनको 21 दिन की मजदूरी और आने जाने का खर्चा देना था ,यदि ये व्यवस्था हो जाती तो शायद ये पलायन भी नही करते ।इस पलायन से ये बीमारी कहीं गांवों तक पहुंच गई तो इससे निजात पाना प्रत्येक सरकार के लिए भारी पड़ेगी । 

शुक्रवार, 8 जनवरी 2021

लोकतंत्र पर सत्ताधारियों का कहर

 आज कल देखा जा रहा है।कुछ राष्ट्रों जैसे ब्राजील,पोलेंड,बेनेजुवेला ,तुर्की,अमरीका,भारत इन सभी देशों में सत्ताधीश कोरोना बीमारी का लाभ  उठा कर मनमानी पर उतारू हैं ।                                             स्वतन्त्र संस्थाओं पर न्यायपालिका पर चुनाव आयोग ,पर रिज़र्व बैंक जैसी संस्थाओं पर इन सत्ताधीशों का एकाधिकार हो गया है ।सत्ता का परिवर्तन लोकतंत्र में सेना की बजाय जनता के माध्यम से तानाशाहों का चुनाव सत्ता परिवर्तन के लिए किया जा रहा है ,झूठे वादे लोकलुभावन भाषणों के जरिये जनता को गुमराह करके सत्ता हथियाने का प्रयास किया जा रहा है ।ये लोग भूल रहें हैं ये परिवर्तन स्थाई नही हो सकता जनता वायदे भूलती नही ,पूरे न होने पर उखाड़ना भी जानती है 

कृषि बिल 2020

 पिछले 40 दिनों से पंजाब, हरियाणा ,उत्तरप्रदेश के किसान कडकती ठंड में इस बिलके विरोध में दिल्ली में लाखों की संख्या में डेरा डाले बैठे हैं ।और सरकार इस बिल को वापस लेने को तैयार नही हो रही ।देश का अन्नदाता2'तापमान पर सड़क पर ठंड में सिकुड़ रहा है ।और सरकार अंधी बनी हुई है ।अजीब विडम्बना है इस देश मे किसान को कभी न्याय नही मिला चाहे अंग्रेजी राज रहा हो या अपने देश का राज रहा हो ।इतिहास कहता है इस देश में ग्रामपंचायत नुमा प्रजातंत्र  सदियों से कायम था ,गांव खुशहाल थे सामाजिक तानाबाना सौहार्दपूर्ण था । सम्पन्नता और विपनन्ता में भेद नही था ।प्रजा अपनी अपनी हैसियत के मुताबिक जीवन यापन करती थी ।इस देश मे कृषि और खुदरा व्यपार जीवन जीने का साधन था न कि व्यवसाय ।इस बृहत क्षेत्र पर काबिज होने का हमेशा से कुछ पूंजीपतियों की निगाह रही है इस पर नियंत्रण करने के प्रयास शासक के द्वारा या शासन के माध्यम से होता रहा है ।सबसे पहले शेरशाह सूरी द्वारा (मालगुजारी ) की प्रथा लागू करके इस पर कब्जा किया ।जिसे अकबर बादशाह ने भी अपनाया और टोडरमल के द्वारा भूमि का सीमांकन कराया गया ।उसके बाद अंग्रजों द्वारा (जमींदारी) प्रथा लागू करके ।1832 में "भूमि सुधार बिल" charterlaw इंग्लैंड में लागू किया और शासन की बागडोर पूंजीपतियों के हाथ सौंप दी ।उसी तर्ज पर वर्तमान कानून का नया नाम "कृषि बिल" बना कर देश के किसानों पर बिना उनसे सलाह लिए थोपने का प्रयास किया जा रहा है ।सरकार इस व्यवस्था का एक वर्ग जो आढ़तिया कहलाता है उसे बिचोलिया बता कर अलग करना चाहती है और इसकी जगह contract forming के नाम पर कॉरपोरेट सेक्टर के हाथों में इस व्यवस्था को देना चाहती है ।जिसे किसान वर्ग मंजूर नही करता।इस व्यवस्था में जो सरकार कह रही है उसे कानूनी रूप न देते हुए सिर्फ शब्दो के झूठे आश्वासन दे कर भृमित कर रही है ।विश्व मे एक मात्र देश है जहाँ चार मौसमो की वजह से विभिन्न प्रकार की सब्जियां ,फल ,अनाज उगाया जाता है ,यहां अनाजों की सेंकडो जातियां,फलों के विभिन्न स्वाद ,सब्जियों की अलग-2किस्में पाई जाती हैं ।जिनका स्वाद क्षेत्रों की जलवायु के आधार पर पाए जाते हैं ।कश्मीर के सेव और हिमाचल के सेव की क्वालिटी और टेस्ट में फर्क कि है ,छतीसगढ़ के चावल और पंजाब के चावल के स्वाद में फर्क पाया जाता है ।उनका भंडारण करना किसी एक संस्था के द्वारा सम्भव नही है ।  इसी को ध्यान में रखकर गांव स्तर पर उत्पादन वितरण और भंडारण की व्यवस्था छोटे-छोटे व्यापारी आढ़ती,और किसानों के बीच बता हुवा है ।और यही इस वर्ग के जीवन यापन का साधन है ।गांव का किसान इन्ही आढ़तियों को अपना ATM कहता है जो इनके लिए 24 घण्टे उपलब्ध है बिना किसी पेपर वर्क के जो किसी कॉर्पोरेट हाउस के द्वारा संभव नही हो सकती ।इस व्यवस्था को जो पुरातन है उसे सरकार तोड़ना चाहती है।                                      वितरण-भंडारण की व्यवस्था :-                                                       शासन अपनी व्यवस्था की कमियों को दूर करने के बजाए इसे प्राइवेट हाथों में देकर अपनी जवाबदारी से मुक्त होना चाहती है ।प्रजातन्त्र में तंत्र को प्रजा के अनुसार काम करना चाहिए ।शासकीय वितरण और भंडारण व्यवस्था में भारी भरस्टाचार और अनियमतायें हैं उन्हें दूर करने के बजाय  उससे छुटकारा पाना चाहती है ।मंडियों में बारदानों की कमी भंडारण की कमी समय पर अनाज के खरीदी की व्यवस्था में भारी अनियमतायें जिससे किसानों का लाखो टन अनाज खराब हो जाता है ।उचित संख्या में कोल्ड स्टोरेज न होने के कारण लाखो टन सब्जियां ,फल सड़ जाता है सहकारिता और भागीदारी :-                                                      उपरोक्त समस्या का समाधान ग्रामपंचायत स्तर पर किसान और सरकार की सहभागिता से संभव हो सकता है ,उपज का भंडारण  सहकारिता में और वितरण शासन द्वारा प्राइवेट सेक्टर के माध्यम से किया जाए तो किसान को उचित मूल्य मिलेगा ।आज देश अनाज और फलों के उत्पादन में सरप्लस की स्थिति में उसका भंडारण वितरण और निर्यात और मार्केटिंग की जाती तो किसान को इनकी उपज की अच्छी कीमत मिलती ।देश का 86%किसान 1.5 से 2 एकड़ जमीन पर अपना जीवन यापन करता है यूरोप और अमेरिका में हजारों एकड़ के खेत होते हैं जब वहां कॉर्पोरेट फॉर्मिंग सफल नही तो इतने छोटे रकबे के खेतों से कैसे सफल होंगे ।इसमें किसान और उससे जुड़े व्यवसाइयों का उत्पीड़न ही होगा ।इसका एक ही इलाज है कॉरपरेट फार्मिंग की जगह कोऑपरेटिव फार्मिंग के लिए ग्राम पंचायत स्तर पर छोटे किसानों को जोड़ कर खेती कराई जाए ।अन्यथा जिस प्रकार के e commerce cos के द्वारा रिटेल व्यापार को खत्म करने का प्रयास हो रहा है और देश के 7 करोड़ खुदरा व्यापारी जो 45 करोड़ लोगों का पेट भरते हैं उसी प्रकार कॉर्पोरेट फार्मिंग से करोडों किसानो पर जीवनयापन का संकट आ जाएगा ।समस्या का निदान के बजाय उसका ट्रांसफर करना उचित हल नही होता ।शासकीय व्यवस्था में जवाबदेही फिक्स करके ही हल निकाला जा सकता है।         पूंजी की व्यवस्था;--                                                                     जब कॉर्पोरेट हाउस  शेयर मार्केट में शेयर फ्लोड करके पब्लिक से पूंजी इकट्ठा कर सकती है ।तब सरकार क्यों नही । सरकार को इन सभी छोटे किसानों को जोड़ कर छेत्र वार कोऑपरेटिव सोसायटी बना कर उचित प्रबंधन के तहत पूंजी की व्यवस्था करके  बीज ,खाद ,मशीन,पानी,भंडारण, वितरण,और मार्केटिंग करना चाहिए ।प्राइवेट हाथों में किसानों को सौंपने की बजाय सरकार सहकारिता के द्वारा किसानों को  उचित दाम और मार्ग दर्शन दे सकती है कृषि विश्वविद्यालय  भी इसमें अहम भूमिका निभा सकते है कुछ गांवों को गोद ले कर नई नई किस्मो को ऊगा कर उसके बीज की मार्केटिंग की जा सकती है । अभी तक FCI ओर वितरण संघो के द्वारा भंडारण और वितरण होता आया है इस व्यवस्था में भारी भृस्टाचार व्याप्त है इनका managment प्रोफेशनल लोगो से कराना होगा पुरानी व्यवस्था के नॉकरशाह भृष्ट हो गए है ।उन्हें अलग करना होगा                                                        MSP:--सरकार ने कुछ जिंसों की MSP तय की हुई है लेकिन इस रेट पर खरीदी नही होती पूरे देश मे कुल  6%  अनाज की  खरीदी हो पाती है ।सिर्फ पंजाब और हरियाणा में 80 से 90% अनाज की खरीदी होती है क्योंकि इन राज्यों की मंडी व्यवस्था वहां के किसानों के सहयोग से अच्छा काम कर रहीं हैं। इसी तर्ज पर देश के दूसरे राज्य मंडी व्यवस्था करले तो उनकी कुछ फसल की कीमत तो MSP पर बिकेगी ।जिससे उन्हें कुछ राहत मिलेगी और आत्महत्याओं में कमी आएगी ।अब सवाल ये होगा इतना भारी उत्पाद को खरीदने के लिए धन राशि का ििइंतजआम कैसे हो तो उसका जवाब है कि सरकार विश्वस्तर की qwality के उत्पादन के लिए किसान को प्रोत्साहित करें उसे उन्नत बीज उपलब्ध कराए । तब तक उपलब्ध अनाज पर सब्सिडी दे कर विश्व बाजार में बेचे जब तक विश्वस्तर की क्वालिटी का उत्पादन शुरू न हो जाये ,एक से दो साल तक ये घाटा उठाना पड़ेगा उसके बाद तो विश्वस्तरीय क़्वालिटी के उत्पादन का भाव  मिलने लगेगा ।जब कॉर्पोरेट हाउस के डिफॉल्टर का कर्ज माफ किया जा सकता है तो किसानों की फसल पर हुए घाटे को क्यों नही? यदि किसान ने उत्पादन बन्द कर दिया तो 1967-68 की स्थिति आ जाएगी ।।                                            सब्सिडी:--दुनिया के देश अपने किसानों को खेती बचाने के लिए भारी सब्सिडी देते रहें है जिसमे सबसे ज्यादा अमेरिका अपने किसानों को 800bn डॉलर की सब्सिडी देता है ,चीन 212bn, यूरोपियन संघ39bn जापान46bn डॉलर जबकि सबसे ज्यादा किसानों की आबादी वाला देश भारत 30 bn डॉलर की सब्सिडी देता है। जो ऊंट के मुंह मे जीरे के बराबर है ।इसलिए चूंकि हमारे पास इतने संसाधन नही हैं इसलिए  msp पर  अनाज खरीद कर उसके विपणन और निर्यात करके इन किसानों की सहायता कर सकते हैं ।मंडियों का जाल ब्लॉक स्तर पर फेल कर pp मॉडल में वेयरहाउस ,कोल्डस्टोरेज बनवाकर संग्रहन ,की व्यवस्था की जा सकती है ,पैकेजिंग,उधोग को टैक्स में छूट दे कर प्रोत्साहित कर के निर्यात में टैक्स की छूट देकर नए लोगो को जोड़ कर व्यापार बढ़ाकर नए रोजगार का सृजन किया जा सकता है ।