आज पूरे विश्व मे ये वायरस महामारी बन गया है हजारो लोग मर रहे हैं।सम्पन्न देशों में इसका प्रकोप ज्यादा भयावह है।जो विज्ञान के पुरोधा और आर्थिक रूप से सम्पन्न देश भी इसके आगे घुटने टेकने को मजबूर हैं ।भारत मे अभी वैसी स्थिति नही आई है ।फिर भी देश के प्रधानमंत्री ने 21 दिन का कर्फ्यू लगा दिया ।परन्तु कर्फ्यू लगने के बाद देश का मजदूर वर्ग जो शहर में निर्माण, सेवा आदि कार्यो में लगे थे कर्फ्यू की परवाह न करते हुए सार्वजनिक आवागमन के साधन बन्द होने कारण पैदल ही अपने अपने राज्यों की और पलायन करने को मजबूर हो गए ।इन लाखो की भीड़ जिसमे गर्भवती महिलाएं,बूढ़े,बच्चे हजारो किलोमीटर की यात्रा पैदल, रिक्शा,ऑटो आदि से भूखे प्यासे अपने ग्रहों को निकल पड़े ।यह देख कर मुझे आभास हुवा की 72 साल की आजादी के बाद भी इस देश की जनता को इस देश के तंत्र पर भरोसा नही रहा ।इन्हें अपने नेतावों अफसरों पर भरोसा नही रहा।जवान ,बूढ़े,बच्चे 100,200,400,किलोमीटर तक पैदल निकल पड़े ।ये जाहिर करता है कि जनता को अपने शासक पर भरोसा नही रहा।देश के बंटवारे के समय तो लोग बैलगाड़ियों से आते जाते रहे इस बार तो वो साधन भी नही रहा। अफसोस आजादी के बाद मेरे देश का मजदूर वर्ग अपने आप को जिंदा रखने के लिए अपने अपने गांवों को पलायन करने पर उतारू हो गया ।आखिर देश का शासक वर्ग किसके लिए सत्ता पर आसीन है ।। लाखो मजदूर वर्ग का शहरों से गांवों की और पलायन करने वो भी कोरोना महामारी के बजाय जिंदा रहने के लिए ।स्वयं के अस्तित्व को बचाने के लिए हजारो किलोमीटर भूखे प्यासे बिना पैसे के अपने पैतृक गांव के लिए निकलना ये इस देश विभिन्न प्रान्तों की सरकारों की कार्यशैली और विस्वास पर प्रश्नचिन्ह लगाता है ।नही तो क्या कारण है lock down लगाने के दो दिन बाद ही पलायन शुरू हो गया । जिनके मातहत ये मजदूर काम करते थे उन्होंने बिना भत्ते के भगा दिया ।उन्होंने इनके रहने,खाने,पीने की कोई चिंता नही की ।सरकार ने भी घोषणा करने के पहले ये नही सोच इस असंगठित मजदूर कामगार वर्ग का क्या होगा ।। प्राकृतिक आपदा में जब सरकार पूंजीपतियों ,उधोगपतियों की सहायता के लिए आर्थिक सहायता का प्रोविजन करती है तो इनके लिए क्यों नही ? जिन संस्थावों में या फर्मो में ये मजदूर काम करते थे उन्हें,इनको 21 दिन की मजदूरी और आने जाने का खर्चा देना था ,यदि ये व्यवस्था हो जाती तो शायद ये पलायन भी नही करते ।इस पलायन से ये बीमारी कहीं गांवों तक पहुंच गई तो इससे निजात पाना प्रत्येक सरकार के लिए भारी पड़ेगी ।
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