आज सुप्रीमकोर्ट का आरक्षण के विषय मे फैसला आया कि आरक्षण पाना संविधान के मौलिक अधिकार की श्रेणी में नही आता ।इसलिए उस पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया।तथा उसे मद्रास हाइकोर्ट में अपील करने के लिए आवेदन करने का आदेश दिया । देश के आजाद होने के बाद संसद ने आरक्षण का बिल 10 वर्ष के लिए पास किया था ।कारण सनाढ्य वर्ग द्वारा कुछ जाती विशेष के लोगों को पिछले दशकों से प्रताड़ित किया जाना उनका शोषण करने उनको मानसिक ,सामाजिक ,आर्थिक रूप से प्रताड़ित करने उन जातियों को उच्च वर्ग के बराबर लाने के लिए आरक्षण का प्रावधान रखा गया था ।परंतु पिछले 70 वर्षों से ये आरक्षण की सुविधा इस वर्ग को मिलती जा रही है ।जिसका बहुसंख्यक वर्ग को फायदा नही मिला बल्कि इस बहुसंख्यक समुदाय का कुछ बाहुबली ,रौबदार लोगो ने इसका राजनेतिक लाभ उठाया और अपने परिवार ,नातेदार रिस्तेदारों तक इस कानून का फायदा पहुंचाया ।और अब यह आरक्षण उनको संसद,विधानसभा तक पहुंचने का हथियार बन गया मेरा सुझाव है कि आरक्षण लागू रखा जाए लेकिन इसका स्वरूप बदला जाए ।इससे जातियों के आधार को खत्म किया जाए ।इसका पैमाना आर्थिक रखा जाए ।आर्थिक रूप से जो भी नागरिक कमजोर हो उसे शिक्षा मुफ्त दी जाए ,स्कूल से यूनिवर्सिटी तक कोई फीस न ली जाए ,हो सके तो ड्रेस भी फ्री की जाए ।आने जाने का खर्चा भी दिया जाए ।जीवनयापन के लिए न्यूनतम भत्ता भी दिया जाए ।लेकिन नॉकरी या व्यवसाय के लिए योग्यता का मेरिट तय किया जाए उसमे आरक्षण बिल्कुल नही दिया जाए ।आर्थिक संपन्नता और विपन्नता का एक स्केल तय किया जाय ।उसके आधार पर आरक्षण देना उचित होगा ।इसमे सवर्ण वर्ग,सम्पन्न वर्ग को भी कोई आपत्ति नही होगी ।इसमें सरकार का खर्च बढ़ेगा उसकी वसूली भी रिज़र्वेशन सेस लगा कर बजट में प्रावधान किया जा सकता है ,जब तक कि यह तबका मैन स्ट्रीम में नही आ जाता ।यह भी गणना की जाए की देश मे अनुसूचितजाति, जनजाति की जनसंख्या कितनी है ।उनमें आर्थिक रूप से कितने परिवार कमजोर हैं ,इसीप्रकार सवर्णों में कितने परिवार गरीबी रेखा के नीचे है उनके आंकड़ों के आधार पर बजट बनाया जा सकता है ।
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