दो विपरीत विचारधारावों के देशों में विश्वशक्ति बनने की होड़ ने पूरे विश्व की मानव जाति को "कोरोना'' जैसी महामारी के संकट में दाल दिया ।अमरीका जैसा देश जो सैन्य और आर्थिक रूप से विश्व को अपना लोहा मनवाता था ,वो भी इस वायरस के सामने घुटने टेकने को मजबूर हो गया ।30 साल पहले तक आर्थिक रूप से विपन्न ,जनसंख्या बहुल, साम्यवादी राष्ट्र चीन ने अमरीका और यूरोपीय राष्ट्रों की पूंजी से पोषित कारखानों को अपने देश मे स्थापित करके दुनिया का इंडस्ट्रियल हब बन गया ।जनसंख्या की बहुलता और आर्थिक संपन्नता ने उसे विश्व का सिरमौर बनने की महत्वकांक्षा ने उसे बायोलॉजिकल वेपन बनाने को मजबूर कर दिया ।उसे नही मालूम था कि भस्मासुर बन कर किसी को जलाने का आशीर्वाद उसे ही जल देगा ।करोड़ो लोगो की जान लेने के बाद भी दुनिया के सामने मौत के आंकड़े छिपाने का प्रयास कर रहा है । दूसरा पहलू यह भी हैं कि कोरोना वार कहीं फार्मा कंपनियों और बीमा कंपनियों के द्वारा विश्व के आर्थिक तंत्र पर कब्जा करने की योजना तो नहीं? नही तो क्या कारण है कि वेक्सीन बनाने की योजना वायरस फैलने के पहले कैसे बनने लगी ।। तीसरा पहलू यह है कि विश्व मे हथियारों की मांग कम हो जाने की वजह से तथा देशों में युद्ध के दुष्परिणाम भोगने के कारण आपसी बातचीत से समस्या के हल की बढ़ने की प्रवर्ति के कारण हथियार निर्मातावों द्वारा इस बायोलॉजिकल वेपन का इस्तेमाल करके भय का वातावरण निर्मित किया जाए ।। परन्तु इससे हासिल क्या हुवा ,बुजुर्ग आबादी तो अपने समय पर खत्म हो जाएगी ।लेकिन नवजात 5 से 10 साल की आबादी का तो भविष्य चौपट हो गया ।उनका घर से निकलना ,स्कूल जाना ,खेल के मैदान का सुना होना ,कंप्यूटर के सामने बैठकर पढ़ाई करने ,work from home से शारीरिक ,मानसिक बीमारियों का घेरना इस मानव जाति के उत्थान पर प्रहार कौन से भविष्य का निर्माण करेगा ये विचारणीय प्रश्न है ।विश्व के सिरमौर विकसित देशों द्वारा यदि ये बीमारी फैलाई गई है तो इसमें नुकसान इन्ही का है ।अविकसित देश तो पहले से ही विपदा में हैं ,विकासशील देशों का जरूर ज़्यादा नुकसान होगा क्योंकि उनका विकास रुक जाएगा ।तब इन विकसित देशों का उत्पाद कौन खरीदेगा ।जब खरीददार नही होगा तो उत्पादक देशों का या टेक्नोलॉजी कौन खरीदेगा ।जब खरीदार नही होगा तो इन उत्पादक देशों का भविष्य तो और अंधकारमय हो जाएगा । पश्चिमी देशों में तो युवा पीढ़ी वैसे ही कम है और जो युवा पीढ़ी उन्हें उधोगों में निर्माण के लिए अविकसित या विकासशील देशों से निर्यात होती थी वह रुक जाएगी जब काम करने वाले हाथ नही होंगे तो क्या मशीनों के दम पर वे अपना विकास कर पाएंगे ? आखिर मशीनों को चलाने के लिए युवा हाथ चाहिए । अतिविकसित होने की चाह ने पूरी मानव जाति को अंधकार में डाल दिया है।इन विकसित देशों की पूंजी का क्या होगा जब खर्च करने वाले नही होंगे ।इस कोरोना ने लोगो को घर मे कैद कर दिया ,बाजार बंद कर दिए ।खर्च करने की जगह नही बची ,जमा पूंजी लोग खा गए ।नई आमन्दनी बन्द हो गई तो इस विज्ञान से विकास की अवधारणा विनाश में तब्दील हो जाएगी। भारत जैसे बहुसंख्यक देश मे जिसमे सबसे ज्यादा रोजगार देने वाला असंघठित क्षेत्र जो बिना किसी शासकीय सहायता के अपनाजीवन यापन करता है तथा देश की जीडीपी का 50%हिस्सेदार है ,उसको घरों में कैद कर दिया गया तो इस महामारी से होने वाली मौतों से ज्यादा तो लोग भूख से मर जायेंगे ।67%युवा आबादी वाला देश यदि इस आबादी को रोजगार नही दे पाया तो अराजक स्थिति भी पैदा हो सकती है ।ये कोई सोची समझी चाल तो नही की कुछ पूंजीपति राष्ट्र बची हुई बड़ी आबादी को निरीह बना कर अपने उत्पादों को खपाने का प्रयास बची हुई सम्पन्न आबादी में करना चाहती हो ।देश के कर्णधारऔर सत्ताधारी वर्ग भी ऐसा लगता है कि वो भी इन पूंजीपतियों की साजिश में फंस गया है । जो इस महामारी को हल्के में हैन्डल कर रहा है ।एक साल पुराने अनुभव के बाद भी दूसरे हमले को संभाल नही पा रहा और अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षा की पूर्ति के लिए अधिक से अधिक सत्ता प्राप्त करने के उधेश्य की पूर्ति में लगा हुवा है ।और विपक्ष बीमारी, और इनकमटैक्स,सीबीआई के छापों के डर से विरोध के लिए सड़क पर नही उतर रहा ।दुनिया का सबसे बड़ा वेक्सीन उत्पादक राष्ट्र देश के नागरिकों को वैक्सीन नही लगा पा रहा ।जबकि 1 करोड़ लोगों को प्रतिदिन वैक्सीन इस देश मे लगाने का इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद है 1 माह में 30 करोड़ लोगों को वैक्सीन लगाई जा सकती है ।जिससे हम इस महामारी से 2 माह में निजात पा सकते हैं अभी सिर्फ शहरों को vaccinate करने की जरूरत है ।इसे यही रोक दिया तो गांवों में फैलने से रोका जा सकता है बस इच्छाशक्ति की जरूरत है ।
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