संदर्भ:---संस्कृति के चार अद्ध्याय। स्वामी विवेकानंद ने इसकी व्याख्या इस प्रकार की है कि वेदांत ज्ञान का विषय समझा जाता है जिसमे त्याग और वैराग्य की बातें अनिवार्य रूप से आती हैं ।किंतु इस्लाम मुख्यतः भक्ति का मार्ग है तथा हजरत मुहम्मद का पंथ ,देहदण्डन, सन्यासऔर वैराग्य को महत्व नही देता ।किंतु स्वामी जी की व्याख्या का वेदांत निवर्ती से मुक्त शुद्ध परवर्ती का मार्ग था एवम तात्विक दृष्टि सेइस्लाम की प्रवर्ति मार्ग से उनका विरोध नहीं था ।इसलिए उनका कहना था कि इस देश मे दोनों धर्म के लोगों को मिलकर एक हो जाना चाहिए क्योंकि वेदांती मस्तिष्क और इस्लामी शरीर के संयोग से जो धर्म खड़ा होगा वही विश्व में सर्वोत्तम माना जायेगा ।
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सच कहा स्वामी विवेकानंद ने लेकिन इस दौर में उनके कहे कि व्याख्या भी कुछ लोग अपनी सुविधा से कर रहे हैं।🙏
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