आजादी के ६५ साल बाद देश के सुदूर इलाकों में विकास के नाम पर राजनेतावों और ऑफिसर्स के द्वारा जो जनता के धन की लूट की गई है ,उसी की प्रणीति है ये नरसंहार .यात्रा के नाम पर धनबल और बाहुबल का प्रदर्शन की खीज है ये नरसंहार , अभी भी मौका है सुदूर इलाकों का विकास ईमानदारी से करने का अन्यथा इसकी पुनरावर्ती होती रहेगी .
सोमवार, 27 मई 2013
सोमवार, 1 अप्रैल 2013
सत्ता
सत्ता की चाबी कभी सत्ता लोलुपों के पास नहीं होती .उसकी चाबी तो वैरागी ,निर्लिप्त व्यक्ति के पास होती है।वह कभी सत्ता का लोभी नहीं होता ,उसका धयेय समाज में समभाव ,शांति स्थापना जैसे होती है .जैसे गाँधी ,लोहिया, जयप्रकाश आज इनकी फिर जरुरत है .
बुधवार, 13 मार्च 2013
आक्रोश
मोमबत्ती जला कर विरोध जाताना ये कोई so called high class sociaty का दिखावा नहीं है .बल्कि व्यवस्था और अन्याय के प्रति अंतर आत्मा में भभक रहे ज्वालामुखी की छोटी सी लो है .जिसे समाज और प्रशासन को समझना चाहिए कि सभ्य समाज आपको ज्वालामुखी फूटने की चेतावनी दे रहा है ,जो इसकी अनदेखी या गंभीरता से नहीं लेता वह इसी आग में जल जायेगा .
रविवार, 17 फ़रवरी 2013
रेल बजट 2013-2014
फिर से किराया बड़ाने की बात उठेगी आखिर कब तक जनता पर बोझ डालोगे . सरकार पहले ये तय करे की रेल को उद्योग कीतरह चलाना चाहती है या जन हितार्थ .मेरा सुझाव है की मालगाड़ी के फेरे बडाये जाएँ बैगनो की संख्या बढाई जाये जिसके लिए बैगन कारखाने और बनाये जाये यदि फण्ड की कमी है तो रेलवे पब्लिक बांड जारी कर पब्लिक से रकम ले इस रकम से बैगन कारखाना खोले और माल दुलाई बढ़ाये . आज पॉवर प्रोजेक्ट्स कोयले की सप्लाई की कमी से चालू नहीं हो प् रहे हैं क्योंकि रेलवे के पास बैगन नहीं हैं नई लाइन नहीं हैं देश को बिजली की जरूरत है उद्योग चालू नहीं हो पा रहे कोल इंडिया के पास भरपूर कोयला है पर बैग्नो की कमी से सप्लाई नहीं कर पा रहा है .यदि मालगाड़ियो से भरपूर दुलाई हो तो पसेंजर ट्रेन का भाडा बढ़ाने की जरूरत नहीं पड़ेगी .देश के बड़े शहरों की स्टेशनों को पपप के तहत मॉल रेस्तौरेंट खुलवाए जाएँ इस से ही इतना पैसा आजायेगा की रेलवे का घाटा तो देशके 4 महानगर की जमीन से ही मिल जायेगा . राजनीतक हस्तछेप बिलकुल बंद कर देना पड़ेगा रेलवे बोर्ड को स्वंतत्र निर्णय लेने का अधिकार देना चाहिए तथा समय सीमा और जवाबदारी तय करनी चाहिए
सोमवार, 11 फ़रवरी 2013
खतरे में लोकतंत्र
देश में 70 करोड़ मतदाता हैं जिसमे से 29 करोड़ मतदाता मत देते हैं ,उनमेसे भी 40%मत जिसको मिल जाते हैं वो सांसद या विधायक बन जाता है।याने 120 करोड़ पर 11करोड़ लोगों द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि इस देश के भाग्य विधाता बन गए।इन चुने हुए नेताओं में 50%अपराधी ,बाहुबली,या पूंजीपति प्रर्वती के लोग चुन कर आते हैं।इनमे न तो कोई डाक्टर , न वैज्ञानिक , न समाजशास्त्री और न ही कोई अर्थशास्त्री होता है।ये चारों लोग ही समाज को आगे ले जा सकते हैं।जब ये ही चुन कर नहीं आंएगे तो आम आदमी का उद्धार कैसे होगा।आज देश में आम आदमी का कोई प्रतिनिधि न तो संसद में है और न ही विधानसभा में। जब तक 80%जनता शिक्षित नहीं होगी तब तक इस देश में लोकतंत्र का फायदा इस प्रकार के लोग उठाते रहगे। देश फिर से सामंतवाद की और बढ़ रहा है रियासतों में बट रहा है जितने सांसद उतनी रियासत बनाने की तेयारी हो रही है।
शनिवार, 26 जनवरी 2013
लोकतंत्र एक धोखा
भारत में 70 करोड़ मतदाता हैं उनमे से 27 करोड़ मत पड़ते है ,जिसमे से 40% मत जिसको मिल गए वो चुन लिया जाता है ,याने 11 करोड़ मतदातावोँ के द्वारा चुने गए प्रतिनिधि 120 करोड़ की जनता पर राज कर रहे है , ये कैसा लोकतंत्र है ,
मंगलवार, 3 जुलाई 2012
भारत की राजनीती में पिछडो का आंतक
पिछले २० साल से भारत की राजनीति में पिछड़ों का आंतक छाया है। ऐसा लगता है लोहिया के नाम पर शतको पुरानी अगड़ों की निरकुश शासन प्रणाली से आक्रोशित इस वर्ग ने बदला लेने की भावना से अपनेआप को राजनीति के माध्यम से राज पाकर वो सब सुख आज ही पा लेना चाहते हैं. वर्तमान का राजा बनने की चाह जो दबी हुई थी वो उजागर हो गई.
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