रविवार, 15 सितंबर 2013

असंतुलित विकास

१९४७ में देश की जीडीपी में ५७%हिस्सा कृषि क्षेत्र का था जो देश की ६०%जनता का पेट भरता था /आज २०१३ में देश की जीडीपी का ६०%हिस्सा सेवा क्षेत्र का है जो मात्र २० लाख लोगों को रोजगार प्रदान करता है /ओद्योगिक सेक्टर का जीडीपी में  हिस्सा १४% है क्योंकि देश में एजुकेशन ,हेल्थ ,और कुशल कारीगरों का अभाव है /क्योंकि सरकार ने  अच्छी शिक्षा ,स्वास्थ्य और कोशल विकास पर ध्यान दिया /किसी भी देश को आर्थिक रूप से संपन्न होने के लिए उपरोक्त तीनो चीजों की जरुरत होती है /जिससे उत्पादन बढता है तो क्रय शक्ति बढती  है तो देश का समग्र विकास होता है
सेवा क्षेत्र के योगदान से देश की विकास दर कागजों में तो बढ़ी लेकिन इसका फायदा देश की I.T सेक्टर की कंपनियों के मालिकों को ज्यादा हुवा /इससे उस बेरोजगार कृषक पुत्र को कुछ नहीं मिला जिसका हिस्सा ६०%से घाट कर १४%रह गया /इस कृषक के घर में जन्मा वह नौजवान जिसकी उम्र २५ से ३५ साल के बीच में है उसे अच्छी शिक्षा ,अच्छे स्वास्थ्य ओर कोशल के अभाव ने  बेरोजगार बना दिया इन  युवा बेरोजगारों  की फोज को जब रोजगार नहीं मिलेगा  तो ये नक्सलवाद ओर अराजकता फ़ैलाने में देर नहीं करेंगे /
आज ताइवान ,चाइना ,कोरिया ,जापान ,मैन्युफैक्चरिंग का उनके देश की जीडीपी में ३०%का हिस्सा क्योंकि इन देशों ने सबसे पहले शिक्षा ,स्वास्थ्य और कोशल विकास पर ध्यान दिया
भारत में ४८%बच्चे कुपोषण के शिकार हैं जो किसी भी अफ्रीकन देस्ग की आबादी के बराबरहै/ जब यही कुपोषित बच्चे जवान होंगे तो इनकी कार्यछमता के क्या परिणाम होंगें सोचकर दर लगता है /१४% की क्रषि आमदनी पर देश की ५७%जनता अभावग्रस्त जीवन जी रही है /इनका जीवन कैसा होगा कल्पना करने से भयावह स्थिति निर्मित होती है /जब तक कृषि पर आश्रित जनसमुदाय का कौशल विकास करके ओद्योगिक क्षेत्र में नहीं लगाया जायेगा तबतक न तो कृषि का क्षेत्र मुनाफे में आयेगा और न ही देश का आर्थिक ढाचां मजबूत होगा /रोजगार के अवसर क्या तो उद्योग में हैं या निर्माण में जिनमे बहुसख्यक लोगों को अवसर मिलता है /यही देश के विकास की पहली सीढ़ी है, परन्तु इसके लिए शिक्षा ,स्वास्थ और कोशल प्रथम सीढ़ी है /

मंगलवार, 9 जुलाई 2013

राजनेतिक पार्टियाँ और चुनाव आयोग

आजादी के बाद देश में बहुत सी पार्टियाँ पैदा हो गई हैं मान्यता प्राप्त पार्टी से टिकट नहीं मिलता है तो उस छेत्र का असुन्तुष्ट नेता दम्बंगइ के बल पर नई पार्टी बना लेता है या निर्दलयी चुनाव लड़ लेता है . इस पर बंदिश लगनी चाहिए .३ या ४ पार्टी देश में होनी चाहिए .तथा ये भी देखा जाना चाहिए की इन पार्टियों का गठन लोकतान्त्रिक तरीके से हुवा भी है की नहीं .इन पार्टियों ने अपना हिसाब चुनाव आयोग और आयकर विभाग में सालाना दिया है की नहीं .स्वस्थ लोकतंत्र को चलाने  वाले खुद लोकतान्त्रिक हैं की नहीं .अन्यथा व्यक्तिवादी या संस्थावादी  व्यवस्था कायम हो जाएगी .ओर देश में लोकतंत्र की आड़ में राजशाही या साम्राज्यवादी सोच के लोग शासित  हो जायेंगे .जिससे देश की पूंजी का बटवारा कुछ ही हाथो में हो जायेगा .
कुछ परिवारों ने तो राजनीती को खानदानी पेशा बना लिया है पूरा का पूरा परिवार अपने वन्शान्गुत कार्य को छोड़ कर राजनीती में उतर आये .छ सो तीस  रियासतों को मिलाकर ये देश बना था फिर से नई  रीयासतें  पैदा हो रही हैं ओर सरकारी कारिंदे इन्ही परिवारों की सेवा में लगे हैं आम जनता की किसी को परवाह नहीं है .
राजनीती तो सेवा का छेत्र  है ये तो उओभोग ओर व्यापार का छेत्र बन गया . जनता के पैसे का इतना दुरूपयोग किसी लोकतान्त्रिक देश में नहीं होता .
चुनाव आयोग को अधिक अधिकार देने होंगे वही तय करेगा की कौन चुनाव में खड़ा होने लायक है ओर कोण नहीं उसे मापदंड तय करने होंगे कि कोई  अपराधी, बाहुबली  चरित्रहीन ,अशिक्षित और सामंती प्रवति का व्यक्ति चुनाव में भागीदार न बन जाये . तभी इस देश में कुशल प्रशाशन की कल्पना की जा सकती है .नहीं तो सम्पन्नता और विपन्नता का दायरा बढता ही जायेगा 

सोमवार, 27 मई 2013

नक्सलवादियों द्वारा नरसंहार

आजादी के ६५ साल बाद देश के सुदूर इलाकों में विकास के नाम पर राजनेतावों और ऑफिसर्स के द्वारा जो जनता के धन की लूट की गई है ,उसी की प्रणीति है ये नरसंहार .यात्रा के नाम पर धनबल और बाहुबल का प्रदर्शन की खीज है ये नरसंहार , अभी भी मौका है सुदूर इलाकों का विकास ईमानदारी से करने का अन्यथा इसकी पुनरावर्ती होती रहेगी .

सोमवार, 1 अप्रैल 2013

सत्ता

सत्ता की चाबी कभी सत्ता लोलुपों के पास नहीं होती .उसकी चाबी तो वैरागी ,निर्लिप्त व्यक्ति के पास होती है।वह कभी सत्ता का लोभी नहीं होता ,उसका धयेय समाज में समभाव ,शांति स्थापना जैसे होती है .जैसे गाँधी ,लोहिया, जयप्रकाश आज इनकी फिर जरुरत है .

बुधवार, 13 मार्च 2013

आक्रोश

मोमबत्ती जला कर विरोध जाताना ये कोई so called high class sociaty का दिखावा नहीं है .बल्कि व्यवस्था और अन्याय के प्रति अंतर आत्मा में भभक रहे ज्वालामुखी की छोटी सी लो है .जिसे समाज और प्रशासन को समझना चाहिए कि सभ्य समाज आपको ज्वालामुखी फूटने की  चेतावनी दे रहा है ,जो इसकी अनदेखी या गंभीरता से नहीं लेता वह इसी आग में जल जायेगा .

रविवार, 17 फ़रवरी 2013

रेल बजट 2013-2014

फिर से किराया बड़ाने  की बात  उठेगी आखिर कब तक जनता पर बोझ डालोगे . सरकार  पहले ये तय करे की रेल को उद्योग कीतरह चलाना  चाहती है या जन हितार्थ .मेरा सुझाव है की मालगाड़ी के फेरे बडाये जाएँ बैगनो की संख्या बढाई जाये जिसके लिए बैगन कारखाने और बनाये जाये यदि फण्ड की कमी है तो रेलवे पब्लिक बांड जारी  कर पब्लिक से रकम ले इस रकम से बैगन कारखाना खोले और माल दुलाई बढ़ाये . आज पॉवर प्रोजेक्ट्स कोयले की सप्लाई की कमी से चालू नहीं हो प् रहे हैं क्योंकि रेलवे के पास  बैगन नहीं हैं नई लाइन  नहीं हैं देश को बिजली की जरूरत है उद्योग चालू नहीं हो पा रहे कोल इंडिया के पास भरपूर कोयला है पर बैग्नो की कमी से सप्लाई नहीं कर पा  रहा है .यदि मालगाड़ियो से भरपूर दुलाई हो तो पसेंजर ट्रेन का भाडा बढ़ाने की जरूरत नहीं पड़ेगी .देश के बड़े शहरों की स्टेशनों को पपप के तहत मॉल  रेस्तौरेंट खुलवाए जाएँ इस से ही इतना पैसा आजायेगा की रेलवे का घाटा  तो देशके  4 महानगर की जमीन से ही मिल जायेगा . राजनीतक हस्तछेप बिलकुल बंद कर देना पड़ेगा रेलवे बोर्ड को स्वंतत्र निर्णय लेने का अधिकार देना चाहिए तथा समय सीमा और जवाबदारी तय करनी चाहिए 

सोमवार, 11 फ़रवरी 2013

खतरे में लोकतंत्र

देश में 70 करोड़ मतदाता हैं जिसमे से 29 करोड़ मतदाता मत देते हैं ,उनमेसे भी 40%मत जिसको मिल जाते हैं वो सांसद या विधायक बन जाता है।याने 120 करोड़ पर 11करोड़ लोगों द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि इस देश के भाग्य विधाता बन गए।इन चुने हुए नेताओं में 50%अपराधी ,बाहुबली,या पूंजीपति प्रर्वती के लोग चुन कर आते हैं।इनमे न तो कोई डाक्टर , न वैज्ञानिक , न समाजशास्त्री और न ही कोई अर्थशास्त्री होता है।ये चारों लोग ही समाज को आगे ले जा सकते हैं।जब ये ही चुन कर नहीं आंएगे तो आम आदमी का उद्धार  कैसे होगा।आज देश में आम आदमी का कोई प्रतिनिधि न तो संसद में है और न ही विधानसभा में। जब तक 80%जनता शिक्षित नहीं होगी तब तक इस देश में लोकतंत्र का फायदा इस प्रकार के लोग उठाते रहगे। देश फिर से सामंतवाद की और बढ़ रहा है रियासतों में बट रहा है जितने सांसद उतनी रियासत बनाने की तेयारी हो रही है।

शनिवार, 26 जनवरी 2013

लोकतंत्र एक धोखा

भारत में 70 करोड़ मतदाता हैं उनमे से 27 करोड़ मत पड़ते है ,जिसमे से 40% मत जिसको मिल गए वो चुन लिया जाता है ,याने 11 करोड़ मतदातावोँ  के द्वारा चुने गए  प्रतिनिधि  120 करोड़ की जनता पर राज कर रहे है , ये कैसा लोकतंत्र है ,