फिर से किराया बड़ाने की बात उठेगी आखिर कब तक जनता पर बोझ डालोगे . सरकार पहले ये तय करे की रेल को उद्योग कीतरह चलाना चाहती है या जन हितार्थ .मेरा सुझाव है की मालगाड़ी के फेरे बडाये जाएँ बैगनो की संख्या बढाई जाये जिसके लिए बैगन कारखाने और बनाये जाये यदि फण्ड की कमी है तो रेलवे पब्लिक बांड जारी कर पब्लिक से रकम ले इस रकम से बैगन कारखाना खोले और माल दुलाई बढ़ाये . आज पॉवर प्रोजेक्ट्स कोयले की सप्लाई की कमी से चालू नहीं हो प् रहे हैं क्योंकि रेलवे के पास बैगन नहीं हैं नई लाइन नहीं हैं देश को बिजली की जरूरत है उद्योग चालू नहीं हो पा रहे कोल इंडिया के पास भरपूर कोयला है पर बैग्नो की कमी से सप्लाई नहीं कर पा रहा है .यदि मालगाड़ियो से भरपूर दुलाई हो तो पसेंजर ट्रेन का भाडा बढ़ाने की जरूरत नहीं पड़ेगी .देश के बड़े शहरों की स्टेशनों को पपप के तहत मॉल रेस्तौरेंट खुलवाए जाएँ इस से ही इतना पैसा आजायेगा की रेलवे का घाटा तो देशके 4 महानगर की जमीन से ही मिल जायेगा . राजनीतक हस्तछेप बिलकुल बंद कर देना पड़ेगा रेलवे बोर्ड को स्वंतत्र निर्णय लेने का अधिकार देना चाहिए तथा समय सीमा और जवाबदारी तय करनी चाहिए
रविवार, 17 फ़रवरी 2013
सोमवार, 11 फ़रवरी 2013
खतरे में लोकतंत्र
देश में 70 करोड़ मतदाता हैं जिसमे से 29 करोड़ मतदाता मत देते हैं ,उनमेसे भी 40%मत जिसको मिल जाते हैं वो सांसद या विधायक बन जाता है।याने 120 करोड़ पर 11करोड़ लोगों द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि इस देश के भाग्य विधाता बन गए।इन चुने हुए नेताओं में 50%अपराधी ,बाहुबली,या पूंजीपति प्रर्वती के लोग चुन कर आते हैं।इनमे न तो कोई डाक्टर , न वैज्ञानिक , न समाजशास्त्री और न ही कोई अर्थशास्त्री होता है।ये चारों लोग ही समाज को आगे ले जा सकते हैं।जब ये ही चुन कर नहीं आंएगे तो आम आदमी का उद्धार कैसे होगा।आज देश में आम आदमी का कोई प्रतिनिधि न तो संसद में है और न ही विधानसभा में। जब तक 80%जनता शिक्षित नहीं होगी तब तक इस देश में लोकतंत्र का फायदा इस प्रकार के लोग उठाते रहगे। देश फिर से सामंतवाद की और बढ़ रहा है रियासतों में बट रहा है जितने सांसद उतनी रियासत बनाने की तेयारी हो रही है।
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