विश्व की आबादी के हिसाब से भारत सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश कहलाता है ,बल्कि लोकतंत्र का जनक भी कहलाता है ।लेकिन समय के साथ इस देश ने राजतंत्र भी देखा और तानाशाही रूपी लोकतंत्र भी देखा ।विदेशी आक्रांताओं का शोषण तथा कदाचार भी देखा ।बहुत संघर्ष के बाद 1947 में इसी देश के गांधी,पटेल,नेहरू,गोखले,मालवीय,जैसे बुद्धिजीवी लोगों के शांति पूर्ण ,अहिंसक आंदोलन से 170 साल पुराने अंग्रेजी शासन से आजादी दिलाई।तथा नया सविंधान बनाया और शपथ ली कि नए संविधान के अनुसार देश की प्रजा को उत्तम शासन से सहूलियत दी जाएगी ।यद्यपि देश ने कांग्रेस के शासन काल में खूब तरक्की की चाहे वो शिक्षा हो, स्वास्थ हो, विज्ञान हो ,उद्योग हो,लेकिन जनसंखया की व्रद्धि के साथ इसका सामंजस्य नही बैठा सके ।यद्यपि देश की शिक्षा संस्थाओं ने उच्चकोटि के इंजीनियर, डॉक्टर, वैज्ञानिक,तैयार किये लेकिन उनको देश मे खपाने की व्यवस्था नहीं के सके ,जिसके कारण 90% ये ज्ञान विदेशों में चला गया और ये पलायन अभी भी जारी है। इसकी वजह जो मुझे समझ मेआई इसका कारण हमारे राजनेतिक वर्ग में इस ज्ञान के उपयोग का अभाव समझ मे आया ।जो राजनेतिक क्षेत्र सेवा का कहलाता था ,उसका व्यवसायीकरण हो गया ।चुनाव का खर्च बढ़ गया प्रचार का खर्च बढ़ गया ।जहां सरस्वती का वास होता है वहाँ लक्ष्मी का वास नही होता ये सनातनी कहावत यहां चरितार्थ होती है ।बुद्धिजीवियों ने राजनीति से तौबा करली और राजनीति में बाहुबली,पूंजीपतियों का पर्दापण हो गया,उनका उद्देश्य स्वयं को बनाना और स्थापित करना रह गया ।इन्होंने राजनीति को सेवा की जगह व्यवसाय बना लिया ।सायकिल पर चल कर पार्षद फार्च्यूनर में चलने लगा झोपड़ी को महलनुमा मकान बना लिया ।देश मे अमीरों की संख्या बढ़ने लगी ।गरीबो की संख्या बढ़ने लगी ,देश की 10%आबादी के पास देश की 77%संपत्ति पर कब्जा हो गया ।और ये पूंजीपति इस पूंजी को ले कर विदेशों में रहने और निवेश करने लगें।अर्थात के ईस्ट इंडिया कंपनी बन गई ।आज भारत विश्व की 5वीं बड़ी अर्थव्यवस्था कहलाती है फिर भी 80 करोड़ लोगों को फ्री अनाज बांटा जा रहा है ।जबकि इस देश की 21% जनता ही शिक्षित है जो दुनिया के 40वैं पायदान पर है । प्रति व्यक्ति आय की गणना की जाए तो भारत का दुनिया मे 142वा स्थान है जो अंगोला से भी कम है,जर्मनी,कनाडा की आय हमसे 20गुना यूके की 18गुना फ्रांस की 17 गुना अमरीका की 31 गुना हमारे पड़ोसी चाइना जिसकी आबादी हमसे ज्यादा है 5 गुना ज्यादा है इसकी वजह इस देश की राजनैतिक पार्टीयां सिर्फ अपने नेतावों को पोषित करती हैं और स्वयं को राजगद्दी पर येन केन बैठे रहने के प्रयास में लगी रहती हैं।इसका इलाज जनता को शिक्षित करना ,शिक्षित बुद्धिजीवी प्रतिनिधियों को उतारना होगा।जनता के चंदे से चुनाव लड़ना स्वयं के खर्च को घटाना ,प्रचार के तरीक़े को बदलना होगा। इसके बाद सत्ता में आने के बाद ज्ञान के पलायन को रोकना होगा ,जनभागीदारी की योजनाओं का जाल बिछाना होगा देश के ज्ञान का उपयोग देश के उत्पादन में ही करना होगा ,देश मे लोकतंत्र तभी सफल होगा ।अन्यथा ये तथाकथित राजनेतावों के द्वारा शासित राजतन्त्र बन कर रह जायेगा ।
बुधवार, 19 जुलाई 2023
सोमवार, 8 मई 2023
भारत मे लोकतंत्र बनाम चुनावी राजतन्त्र।
उपरोक्त विषय मे मेरा अपना सोचना है कि भारत मे लोकतांत्रिक प्रणाली इस देश की अपनी पोषित प्रणाली न हो कर एक थोपी हुई प्रणाली है जो कि यूरोप के बहुतायत देशों के द्वारा पोषित की गई है ।और उसे उनके द्वारा शासित देशों पर उनके खुद के स्वार्थ सिद्धि के लिए थोपी गई है ।नहीं तो जैसा मैंने 3 साल कनाडा में रह कर देखा और वहां के चुनावों के क्रियान्वयन को नजदीक से देखा तो पाया कि वहां जनप्रतिनिधियों का सम्मान तो है परन्तु उनको जनता द्वारा इतनी अहमियत नहीं दी जाती ।वहां का जनप्रतिनिधि चाहे वो सांसद हो या विधायक उसका आवागमन ,रहनसहन आम जनता की तरह ही होता है ।उसे कोई विशेष अधिकार नही होते ,उसका काम जनता को सुविधा पहुंचाने के लिए उपयुक्त कानून बनाने तक ही सीमित रहते हैं ।उसके लिए उन्हें कोई पारितोषिक या तन्ख्वाह नहीं मिलती मीटिंग अटेंड करने का भत्ता भर मिलता है ।उनके रहने की व्यवस्था उनकी खुद की है ,उनके लिए आवासों का आबंटन होता है उसका किराया उन्हें स्वयं वहन करना पड़ता है शासकीय कामो के लिए वाहनों की व्यवस्था शासकीय रहती है,परन्तु स्वंय के उपयोग के लिए शासकीय वाहन वर्जित होते हैं ।। अर्थात वहां कानून का राज है न कि विधायिका का।उदाहरण के लिए मेने वहां मोंट्रियल में स्थित गांधीपार्क में गांधीजी की मूर्ति स्थापित करने के लिए आदरणीय श्री शरद यादव से अनुरोध करके तत्कालीन विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज के प्रयासों से जनवरी 2019 में गांधीजी की आदमकद मूर्ति भिजवाई । जिसे पार्क में स्थापित करने के लिए वहां के कमिश्नर को कनाडा के प्रधानमंत्री श्री ट्रुडो से चुनाव प्रचार के दौरान हुई मुलाकात के समय मदद करने की विनती की तो उनका जवाब था कि वो कमिश्नर के कार्य क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं कर सकते ।क्योंकि वे कानून से बन्धे हैं।लिखने का मतलब वहां कानून और स्थापित नियमो का पालन होता है ।वहां कानून सर्वोपरि है न कि जनप्रतिनिधि, कानून और नियम को सर्वोपरि माना जाता है।व्यवहारिक तौर पर तो यहां भी कानून का राज है लेकिन व्यवहारिकता कुछ अलग है ।। इसकी जब समीक्षा की तो महसूस किया कि इस देश की जीवन प्रणाली व्यक्ति प्रधान रही है ।त्रेता युग मे रामराज था जहां श्री राम जनता के बीच सर्वमान्य राजा थे उनको मर्यादापुरुषोत्तम की उपाधि से सम्मानित किया गया ।क्योंकि उनका आचरण वैसा था ।दूसरी तरफ द्वापर युग मे श्री कृष्ण पूजित हुए जो मर्यादा तोड़ू कहलाये ।परन्तु धर्म रक्षक के रूप में अवतरित हुए,पापियों, दुराचारियों के लिए विध्वंशक के रूप में अवतरित हुए।अर्थात दोनों युग व्यक्ति पूजक रहे ।इसीप्रकार वर्तमान कलयुग में भी चक्रवर्ती राजावों के रूप में चाहे नन्द वंश हो या मौर्य वंश, मुगलवंश या अंग्रेजी शासन इसमें आखरी का अंग्रेजी शासन के पहले व्यक्ति विशेष ने ही राज किया ।चाहे हर्षवर्धन हो अशोक हो चन्द्रगुप्त हो अकबर और औरंगजेब हो ।शायद इसीलिए वर्तमान प्रणाली में राजनीतिक पार्टियां किसी न किसी परिवार के द्वारा संचालित हो रही हैं या किसी वर्ग विशेस के संगठन के द्वारा ।देश के केंद्र के नेतृत्व के लिए चेहरे को प्रधानता दी जा रही है और अब राज्य स्तर पर भी चेहरे को प्रमुखता दी जा रही है ।इस सब को देख कर मुझे ये एक अनुवांशिक गुण या बीमारी लगती है ।इस देश के या महाद्वीप में जिसमे व्यक्ति पूजक की संख्या ज्यादा है वनस्पति जन प्रतिनिधि के ।यद्यपि ब्रिटेन जिसने 167 देशों पर राज किया वी चार्ल्स द्वितीय के बाद राजा विहीन हो गया था ,तब राजतन्त्र को चलाने के लिए वहां के पूंजीपतियों के संघठनो ने इस देश की बागडोर संभाली जिसमे east india co और bey hudson जेसी पूंजीपति सोच की कंपनियों के प्रतिनिधि यों की सलाह पर लोकतांत्रिक प्रणाली को ईजाद किया ।जिसमें इनका पूंजीवादी हित निहित था ।जिसमे एक राजा के स्थान पर बहुसंख्यक राजावों(जनप्रतिनिधि) को अपनी पूंजी की मदद से चुनवा कर अपना हित साधा जा सके।इसे या तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शासन करने का षड्यंत्र समझलो या सर्वमान्य शासन प्रणाली । कमियां तो हर प्रणाली में मिलेंगी परन्तु उन खामियों का प्रतिशत नापने के मापदंड होना चाहिए जो इस प्रणाली में भी होगा परन्तु व्यवहार में दिखता नही है । फिर भी इस प्रणाली में जिन जिन देशों ने इस के चार स्तम्भों में सबसे मजबूत कानून के स्तंभ का पालन किया उस देश की जनता सुखी है ।क्योंकि कानून सर्वोपरि है और उसका अनुपालन कराने वाले जनप्रतिनिधियो का हस्तक्षेप नगण्य है ,परन्तु जो देश पुरातन राजतन्त्र से पोषित हुवा है, उस देश मे कानून के ऊपर इंसान विशेष प्रधान रहा हो वहां लोकशाही का सफल होना सन्देहास्पद।जो कि वर्तमान में इस देश मे देखा जा रहा है।कानून का भी बंटवारा हो गया व्यक्ति विशेष के लिए अलग और साधारण व्यक्ति के लिए अलग।इसे निष्पक्ष कानून प्रणाली नहीं कह सकते।इन्ही विशेष सुविधाओं की आकांछा रखनेवाले पूंजीपति, बाहुबली देश की अधिकांश गरीब ,अनपढ़ जनता को लालच ,डर ,आंतक के दम पर चुनाव जीत कर जनप्रतिनिधि का चोला पहन कर लोकतांत्रिक प्रणाली में उल्लेखित सुविधाओं का उपभोग कर रहे हैं ।ओर भोली भाली जनता को जूठे सब्जबाग ,फ्री की रेवड़ी बाँट कर जो उन्ही से टैक्स के रूप में वसूली जा रही है जनता को निकम्मी बनाया जा रहा है, जिसमे हमारी पुरातन सभ्यता के अंश जैसे स्वाभिमानी, सवाबलम्बन जेसे शब्द सिर्फ शब्दकोश में कैद हो कर रह गए ।
गुरुवार, 26 जनवरी 2023
देश मे नेतृत्व परिवर्तन की जरूरत
आज देश मे सत्ता बदलने का समय आ गया है।श्रीमती इंदिरागांधी के समय जो तानाशाही का तरीका अपना कर देश की सत्ता पर काबिज रहने का जो उपाय और प्रयास किये गए थे वही प्रयास वर्तमान सरकार भी कर रही है ।झूठे वादे गरीबो को लुभाने के लिए फ्री अनाज,निजी आवास की रेवड़ी तथा मीडिया की स्वतंत्रता ,न्यायपालिका के अधिकारों में हस्तक्षेप ,कुछ पूंजीपतियों के इशारे पर psu संस्थानों की बिक्री ,सरकारी नॉकरियों में छटनी सेना की भर्ती में हस्तक्षेप ,सरकारी बैंकों से असुरक्षित कर्ज देने का दबाव ये जाहिर करता है कि इन लुभावने जुमलों के आधार पर येन केन प्रकारेण सत्ता में बने रहो ।समाज मे धर्म विभेद, जाती विभेद हिन्दू मुस्लिम में माइक्रो स्तर पर झगड़े ,मंदिर मस्जिद का विवाद ,इस प्रकार निम्न स्तर की सोच का क्रियान्वयन देश की पुरातन गंगा जमनी तहजीब को तोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।जिसके कारण देश आर्थिक रूप से कमजोर हो रहा है। देश पर जीडीपी का 93प्रतिशत कर्ज हो गया जो 30 था ।सड़को के निर्माण की लागत टोलटैक्स से वसूली जा रही है जो रोड टैक्स के अलावा है जिससे मालभाड़े में बढ़ोतरी हो रही है,पेट्रोलियम प्रोडक्ट पर भारी exiseduty लगाई जा रही है ।राज्यों के हिस्से में भेदभाव किया जा रहा है ,ये इस सरकार के आर्थिक मैनेजमेंट की कमियों को दर्शाता है , इन सब कमियों और नीतियों को देखते हुए इस देश की युवा शिक्षित पीढ़ी का भविष्य अंधकारमय दिख रहा है।इसलिए अब इस देश को एक नए नेतृत्व की जरुरत है।इन तमाम कमियों के लिए देश की तमाम राजनैतिक पार्टिया बराबर की दोषी हैं ।इस सरकार ने जो शासन करने की जो दिशा दी है ,भविष्य में दूसरी पार्टियां इसका अनुशरण नहीं करेंगी इसकी क्या गारंटी है ।इन तमाम पार्टियों को इसका ज्ञान हो गया है।इस देश मे बहुसंख्यक वोटर अशिक्षित, और गरीब है उसे वोट की ताकत का ज्ञान नहीं है ।वो पूरे साल तकलीफ में रहता है,और वोटिंग के दिन बिक जाता है उसे उस दिन का खाने का खर्च पार्टियां उठा लेती हैं ।उसे अपने अनिश्चित भविष्य के साथ जीने की आदत हो गई है।और जो सम्पन्न वर्ग है उसे कैसे सुविधा लेनी है उसकी कला वो सीख गया है।। इससे जाहिर होता है कि तमाम राजनैतिक पार्टियां कुछ दबंगों, पूंजीपतियों, और असामाजिक तत्वों का काकस बन गई हैं जो मिलकर सरकारी संसाधनों का और धन का उपभोग कर रहीं हैं।इसमें नॉकरशाह उनके साधन और धन उपार्जन साध्य बन गया ।इसका इलाज एक ही है जो देश की युवा पीढ़ी सड़क पर उतरे और व्यक्तियों का चुनाव करे जिसकी छवि निर्दाग ,निष्कलंक शिक्षित हो जो किसी राजनीतिक पार्टी से जुड़ा न हो जिसे क्षेत्र विशेष में विशिष्टता प्राप्त हो उसे चुन कर लोकसभा ,विधानसभा में भेजे ।तभी इस देश को नई दिशा मिल सकेगी ।उसको जिताने के लिए जनता के बीच मे जाना पड़ेगा जैसे 1974 में शरद यादव को जन प्रतिनुधि के रूप में भेजा था जहां तक चुनाव फण्ड की व्यवस्था का सवाल है एक रुपया एक वोट की पद्धति अपनानी पड़ेगी या जिले स्तर पर कॉलेज,स्कूल यूनिवर्सिटी स्तर पर छात्रों की कमेटी बनानी पड़ेगी जो जनता से सोशल मीडिया के माध्यम से चंदा इकट्ठा करके इसकी व्यवस्था करनी पड़ेगी ।काम कठिन है पर असम्भव नहीं है ।