आज कल देखा जा रहा है।कुछ राष्ट्रों जैसे ब्राजील,पोलेंड,बेनेजुवेला ,तुर्की,अमरीका,भारत इन सभी देशों में सत्ताधीश कोरोना बीमारी का लाभ उठा कर मनमानी पर उतारू हैं । स्वतन्त्र संस्थाओं पर न्यायपालिका पर चुनाव आयोग ,पर रिज़र्व बैंक जैसी संस्थाओं पर इन सत्ताधीशों का एकाधिकार हो गया है ।सत्ता का परिवर्तन लोकतंत्र में सेना की बजाय जनता के माध्यम से तानाशाहों का चुनाव सत्ता परिवर्तन के लिए किया जा रहा है ,झूठे वादे लोकलुभावन भाषणों के जरिये जनता को गुमराह करके सत्ता हथियाने का प्रयास किया जा रहा है ।ये लोग भूल रहें हैं ये परिवर्तन स्थाई नही हो सकता जनता वायदे भूलती नही ,पूरे न होने पर उखाड़ना भी जानती है
शुक्रवार, 8 जनवरी 2021
कृषि बिल 2020
पिछले 40 दिनों से पंजाब, हरियाणा ,उत्तरप्रदेश के किसान कडकती ठंड में इस बिलके विरोध में दिल्ली में लाखों की संख्या में डेरा डाले बैठे हैं ।और सरकार इस बिल को वापस लेने को तैयार नही हो रही ।देश का अन्नदाता2'तापमान पर सड़क पर ठंड में सिकुड़ रहा है ।और सरकार अंधी बनी हुई है ।अजीब विडम्बना है इस देश मे किसान को कभी न्याय नही मिला चाहे अंग्रेजी राज रहा हो या अपने देश का राज रहा हो ।इतिहास कहता है इस देश में ग्रामपंचायत नुमा प्रजातंत्र सदियों से कायम था ,गांव खुशहाल थे सामाजिक तानाबाना सौहार्दपूर्ण था । सम्पन्नता और विपनन्ता में भेद नही था ।प्रजा अपनी अपनी हैसियत के मुताबिक जीवन यापन करती थी ।इस देश मे कृषि और खुदरा व्यपार जीवन जीने का साधन था न कि व्यवसाय ।इस बृहत क्षेत्र पर काबिज होने का हमेशा से कुछ पूंजीपतियों की निगाह रही है इस पर नियंत्रण करने के प्रयास शासक के द्वारा या शासन के माध्यम से होता रहा है ।सबसे पहले शेरशाह सूरी द्वारा (मालगुजारी ) की प्रथा लागू करके इस पर कब्जा किया ।जिसे अकबर बादशाह ने भी अपनाया और टोडरमल के द्वारा भूमि का सीमांकन कराया गया ।उसके बाद अंग्रजों द्वारा (जमींदारी) प्रथा लागू करके ।1832 में "भूमि सुधार बिल" charterlaw इंग्लैंड में लागू किया और शासन की बागडोर पूंजीपतियों के हाथ सौंप दी ।उसी तर्ज पर वर्तमान कानून का नया नाम "कृषि बिल" बना कर देश के किसानों पर बिना उनसे सलाह लिए थोपने का प्रयास किया जा रहा है ।सरकार इस व्यवस्था का एक वर्ग जो आढ़तिया कहलाता है उसे बिचोलिया बता कर अलग करना चाहती है और इसकी जगह contract forming के नाम पर कॉरपोरेट सेक्टर के हाथों में इस व्यवस्था को देना चाहती है ।जिसे किसान वर्ग मंजूर नही करता।इस व्यवस्था में जो सरकार कह रही है उसे कानूनी रूप न देते हुए सिर्फ शब्दो के झूठे आश्वासन दे कर भृमित कर रही है ।विश्व मे एक मात्र देश है जहाँ चार मौसमो की वजह से विभिन्न प्रकार की सब्जियां ,फल ,अनाज उगाया जाता है ,यहां अनाजों की सेंकडो जातियां,फलों के विभिन्न स्वाद ,सब्जियों की अलग-2किस्में पाई जाती हैं ।जिनका स्वाद क्षेत्रों की जलवायु के आधार पर पाए जाते हैं ।कश्मीर के सेव और हिमाचल के सेव की क्वालिटी और टेस्ट में फर्क कि है ,छतीसगढ़ के चावल और पंजाब के चावल के स्वाद में फर्क पाया जाता है ।उनका भंडारण करना किसी एक संस्था के द्वारा सम्भव नही है । इसी को ध्यान में रखकर गांव स्तर पर उत्पादन वितरण और भंडारण की व्यवस्था छोटे-छोटे व्यापारी आढ़ती,और किसानों के बीच बता हुवा है ।और यही इस वर्ग के जीवन यापन का साधन है ।गांव का किसान इन्ही आढ़तियों को अपना ATM कहता है जो इनके लिए 24 घण्टे उपलब्ध है बिना किसी पेपर वर्क के जो किसी कॉर्पोरेट हाउस के द्वारा संभव नही हो सकती ।इस व्यवस्था को जो पुरातन है उसे सरकार तोड़ना चाहती है। वितरण-भंडारण की व्यवस्था :- शासन अपनी व्यवस्था की कमियों को दूर करने के बजाए इसे प्राइवेट हाथों में देकर अपनी जवाबदारी से मुक्त होना चाहती है ।प्रजातन्त्र में तंत्र को प्रजा के अनुसार काम करना चाहिए ।शासकीय वितरण और भंडारण व्यवस्था में भारी भरस्टाचार और अनियमतायें हैं उन्हें दूर करने के बजाय उससे छुटकारा पाना चाहती है ।मंडियों में बारदानों की कमी भंडारण की कमी समय पर अनाज के खरीदी की व्यवस्था में भारी अनियमतायें जिससे किसानों का लाखो टन अनाज खराब हो जाता है ।उचित संख्या में कोल्ड स्टोरेज न होने के कारण लाखो टन सब्जियां ,फल सड़ जाता है सहकारिता और भागीदारी :- उपरोक्त समस्या का समाधान ग्रामपंचायत स्तर पर किसान और सरकार की सहभागिता से संभव हो सकता है ,उपज का भंडारण सहकारिता में और वितरण शासन द्वारा प्राइवेट सेक्टर के माध्यम से किया जाए तो किसान को उचित मूल्य मिलेगा ।आज देश अनाज और फलों के उत्पादन में सरप्लस की स्थिति में उसका भंडारण वितरण और निर्यात और मार्केटिंग की जाती तो किसान को इनकी उपज की अच्छी कीमत मिलती ।देश का 86%किसान 1.5 से 2 एकड़ जमीन पर अपना जीवन यापन करता है यूरोप और अमेरिका में हजारों एकड़ के खेत होते हैं जब वहां कॉर्पोरेट फॉर्मिंग सफल नही तो इतने छोटे रकबे के खेतों से कैसे सफल होंगे ।इसमें किसान और उससे जुड़े व्यवसाइयों का उत्पीड़न ही होगा ।इसका एक ही इलाज है कॉरपरेट फार्मिंग की जगह कोऑपरेटिव फार्मिंग के लिए ग्राम पंचायत स्तर पर छोटे किसानों को जोड़ कर खेती कराई जाए ।अन्यथा जिस प्रकार के e commerce cos के द्वारा रिटेल व्यापार को खत्म करने का प्रयास हो रहा है और देश के 7 करोड़ खुदरा व्यापारी जो 45 करोड़ लोगों का पेट भरते हैं उसी प्रकार कॉर्पोरेट फार्मिंग से करोडों किसानो पर जीवनयापन का संकट आ जाएगा ।समस्या का निदान के बजाय उसका ट्रांसफर करना उचित हल नही होता ।शासकीय व्यवस्था में जवाबदेही फिक्स करके ही हल निकाला जा सकता है। पूंजी की व्यवस्था;-- जब कॉर्पोरेट हाउस शेयर मार्केट में शेयर फ्लोड करके पब्लिक से पूंजी इकट्ठा कर सकती है ।तब सरकार क्यों नही । सरकार को इन सभी छोटे किसानों को जोड़ कर छेत्र वार कोऑपरेटिव सोसायटी बना कर उचित प्रबंधन के तहत पूंजी की व्यवस्था करके बीज ,खाद ,मशीन,पानी,भंडारण, वितरण,और मार्केटिंग करना चाहिए ।प्राइवेट हाथों में किसानों को सौंपने की बजाय सरकार सहकारिता के द्वारा किसानों को उचित दाम और मार्ग दर्शन दे सकती है कृषि विश्वविद्यालय भी इसमें अहम भूमिका निभा सकते है कुछ गांवों को गोद ले कर नई नई किस्मो को ऊगा कर उसके बीज की मार्केटिंग की जा सकती है । अभी तक FCI ओर वितरण संघो के द्वारा भंडारण और वितरण होता आया है इस व्यवस्था में भारी भृस्टाचार व्याप्त है इनका managment प्रोफेशनल लोगो से कराना होगा पुरानी व्यवस्था के नॉकरशाह भृष्ट हो गए है ।उन्हें अलग करना होगा MSP:--सरकार ने कुछ जिंसों की MSP तय की हुई है लेकिन इस रेट पर खरीदी नही होती पूरे देश मे कुल 6% अनाज की खरीदी हो पाती है ।सिर्फ पंजाब और हरियाणा में 80 से 90% अनाज की खरीदी होती है क्योंकि इन राज्यों की मंडी व्यवस्था वहां के किसानों के सहयोग से अच्छा काम कर रहीं हैं। इसी तर्ज पर देश के दूसरे राज्य मंडी व्यवस्था करले तो उनकी कुछ फसल की कीमत तो MSP पर बिकेगी ।जिससे उन्हें कुछ राहत मिलेगी और आत्महत्याओं में कमी आएगी ।अब सवाल ये होगा इतना भारी उत्पाद को खरीदने के लिए धन राशि का ििइंतजआम कैसे हो तो उसका जवाब है कि सरकार विश्वस्तर की qwality के उत्पादन के लिए किसान को प्रोत्साहित करें उसे उन्नत बीज उपलब्ध कराए । तब तक उपलब्ध अनाज पर सब्सिडी दे कर विश्व बाजार में बेचे जब तक विश्वस्तर की क्वालिटी का उत्पादन शुरू न हो जाये ,एक से दो साल तक ये घाटा उठाना पड़ेगा उसके बाद तो विश्वस्तरीय क़्वालिटी के उत्पादन का भाव मिलने लगेगा ।जब कॉर्पोरेट हाउस के डिफॉल्टर का कर्ज माफ किया जा सकता है तो किसानों की फसल पर हुए घाटे को क्यों नही? यदि किसान ने उत्पादन बन्द कर दिया तो 1967-68 की स्थिति आ जाएगी ।। सब्सिडी:--दुनिया के देश अपने किसानों को खेती बचाने के लिए भारी सब्सिडी देते रहें है जिसमे सबसे ज्यादा अमेरिका अपने किसानों को 800bn डॉलर की सब्सिडी देता है ,चीन 212bn, यूरोपियन संघ39bn जापान46bn डॉलर जबकि सबसे ज्यादा किसानों की आबादी वाला देश भारत 30 bn डॉलर की सब्सिडी देता है। जो ऊंट के मुंह मे जीरे के बराबर है ।इसलिए चूंकि हमारे पास इतने संसाधन नही हैं इसलिए msp पर अनाज खरीद कर उसके विपणन और निर्यात करके इन किसानों की सहायता कर सकते हैं ।मंडियों का जाल ब्लॉक स्तर पर फेल कर pp मॉडल में वेयरहाउस ,कोल्डस्टोरेज बनवाकर संग्रहन ,की व्यवस्था की जा सकती है ,पैकेजिंग,उधोग को टैक्स में छूट दे कर प्रोत्साहित कर के निर्यात में टैक्स की छूट देकर नए लोगो को जोड़ कर व्यापार बढ़ाकर नए रोजगार का सृजन किया जा सकता है ।