आजादी के बाद देश में बहुत सी पार्टियाँ पैदा हो गई हैं मान्यता प्राप्त पार्टी से टिकट नहीं मिलता है तो उस छेत्र का असुन्तुष्ट नेता दम्बंगइ के बल पर नई पार्टी बना लेता है या निर्दलयी चुनाव लड़ लेता है . इस पर बंदिश लगनी चाहिए .३ या ४ पार्टी देश में होनी चाहिए .तथा ये भी देखा जाना चाहिए की इन पार्टियों का गठन लोकतान्त्रिक तरीके से हुवा भी है की नहीं .इन पार्टियों ने अपना हिसाब चुनाव आयोग और आयकर विभाग में सालाना दिया है की नहीं .स्वस्थ लोकतंत्र को चलाने वाले खुद लोकतान्त्रिक हैं की नहीं .अन्यथा व्यक्तिवादी या संस्थावादी व्यवस्था कायम हो जाएगी .ओर देश में लोकतंत्र की आड़ में राजशाही या साम्राज्यवादी सोच के लोग शासित हो जायेंगे .जिससे देश की पूंजी का बटवारा कुछ ही हाथो में हो जायेगा .
कुछ परिवारों ने तो राजनीती को खानदानी पेशा बना लिया है पूरा का पूरा परिवार अपने वन्शान्गुत कार्य को छोड़ कर राजनीती में उतर आये .छ सो तीस रियासतों को मिलाकर ये देश बना था फिर से नई रीयासतें पैदा हो रही हैं ओर सरकारी कारिंदे इन्ही परिवारों की सेवा में लगे हैं आम जनता की किसी को परवाह नहीं है .
राजनीती तो सेवा का छेत्र है ये तो उओभोग ओर व्यापार का छेत्र बन गया . जनता के पैसे का इतना दुरूपयोग किसी लोकतान्त्रिक देश में नहीं होता .
चुनाव आयोग को अधिक अधिकार देने होंगे वही तय करेगा की कौन चुनाव में खड़ा होने लायक है ओर कोण नहीं उसे मापदंड तय करने होंगे कि कोई अपराधी, बाहुबली चरित्रहीन ,अशिक्षित और सामंती प्रवति का व्यक्ति चुनाव में भागीदार न बन जाये . तभी इस देश में कुशल प्रशाशन की कल्पना की जा सकती है .नहीं तो सम्पन्नता और विपन्नता का दायरा बढता ही जायेगा